कश्मीर जैसे संवेदनशील और भू-राजनीतिक रूप से अहम मुद्दे पर नैरेटिव की लड़ाई अब केवल ज़मीन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी तेज़ी से लड़ी जा रही है। इसी डिजिटल इकोसिस्टम में ‘सैफ्रॉन किंगडम’ नामक एक फिल्म हाल के दिनों में उभरकर सामने आई है, जिसने अपने कंटेंट और प्रसार के तरीके को लेकर गंभीर संदेह पैदा कर दिए हैं। सतही तौर पर यह फिल्म कश्मीर की कहानी प्रस्तुत करने का दावा करती है, लेकिन गहराई से देखने पर यह एक सुनियोजित नैरेटिव निर्माण का प्रयास प्रतीत होती है।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि फिल्म में घटनाओं को चयनात्मक ढंग से पेश किया गया है, जहां तथ्यों के बजाय एक विशेष विचारधारा को स्थापित करने पर अधिक जोर दिखता है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण इसका डिजिटल प्रसार तंत्र है—जहां इसे प्रमोट करने वाले अकाउंट्स, उनकी गतिविधियां और उनके आपसी नेटवर्क ऐसे पैटर्न दर्शाते हैं, जो सामान्य ऑर्गेनिक ट्रेंड से अलग नजर आते हैं।इन सभी संकेतों के आधार पर यह सवाल और प्रासंगिक हो जाता है कि क्या ‘सैफ्रॉन किंगडम’ केवल एक फिल्म है, या फिर यह एक व्यापक और सुनियोजित प्रोपेगेंडा नेटवर्क का हिस्सा है। इस रिपोर्ट में विस्तार से इसका विश्लेषण किया गया है। इस रिपोर्ट के प्रमुख बिन्दू हैं-
- क्या है फिल्म‘सैफ्रॉन किंगडम’?
- फिल्म निर्माण और प्रमोशन के पीछे कौन?
- कौन हैं गुलाम नबी मीर और कैसे पाकिस्तान से कनेक्शन है!
- कौन है गुलाम नबी फाई?
- पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI से कनेक्शन!
- भारत विरोधी प्रोपेगेंडा का इकोसिस्टम इल्यूजन
1. क्या है फिल्म‘सैफ्रॉन किंगडम’?
वर्ष 2024 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘सैफ्रॉन किंगडम’ को लेकर कई तरह की चर्चाएं और विवाद सामने आए हैं। यह फिल्म खुद को कश्मीरी प्रवासी समुदाय और घाटी में जारी राजनीतिक तनाव पर आधारित बताती है, लेकिन इसकी प्रस्तुति और निर्माण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठते हैं। फिल्म की कहानी कश्मीर की एक महिला ‘मसरत’ के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका पति कथित रूप से अपहरण का शिकार हो जाता है। इसके बाद वह अपने बेटे ‘रिजवान’ के साथ घाटी से पलायन करने को मजबूर होती है। यह कथानक भावनात्मक रूप से प्रभावशाली दिखाने की कोशिश करता है, लेकिन इसमें दिखाए गए घटनाक्रम और संदर्भों की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल हैं। सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि कश्मीर जैसे संवेदनशील और जटिल सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे पर आधारित होने के दावा करने वाली फिल्म में एक भी कश्मीरी कलाकार ने काम नहीं किया है। इसके बजाय, इसमें अमेरिकी और दक्षिण एशियाई पेशेवर कलाकारों को लिया गया है।
इसके अलावा, फिल्म की शूटिंग भी अमेरिका के अटलांटा शहर में की गई है। इससे यह संदेह और गहरा होता है कि फिल्म वास्तविक परिस्थितियों को दर्शाने के बजाय एक विशेष नैरेटिव गढ़ने का प्रयास कर रही है। फिल्म का प्रमोशन अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बड़े स्तर पर किया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसका लक्षित दर्शक वर्ग अंतरराष्ट्रीय है।

2. फिल्म निर्माण और प्रमोशन के पीछे कौन?
फिल्म ‘सैफ्रॉन किंगडम’ के रचनात्मक और निर्माण पक्ष पर नजर डालें तो इसके पीछे काम कर रहे लोगों और संस्थाओं की भूमिका भी गंभीर चर्चा का विषय बनती है। फिल्म का लेखन और निर्देशन अरफत शेख द्वारा किया गया है, जबकि कहानी को विकसित करने में मरियम खालिद और केटी लीमन की भी महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। इस फिल्म के निर्माण से जुड़ा सबसे अहम नाम Daffodil Studios का है, जिसके बैनर तले इस परियोजना को तैयार किया गया। जैसे ही इस स्टूडियो का नाम सामने आता है, फिल्म की पृष्ठभूमि और उद्देश्य को लेकर कई नए सवाल खड़े होने लगते हैं। Daffodil Studios के संस्थापक और प्रेसीडेंट डॉ. गुलाम नबी मीर हैं, जो पेशे से अमेरिका में कार्यरत एक गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट हैं।

3. कौन हैं गुलाम नबी मीर और कैसे है पाकिस्तान से कनेक्शन!
कश्मीर में जन्मे और पले-बढ़े डॉ. मीर ने कश्मीर में अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1974 में अमेरिका चले गए। अमेरिका में अपने शुरुआती सालों के दौरान, उन्होंने ‘इस्लामिक सोसाइटी ऑफ़ नॉर्थ अमेरिका’ ISNA फाउंडर्स कमेटी के संस्थापक चेयरमैन के तौर पर काम किया। 2019 में रिटायर होने के बाद उन्होंने ‘वर्ल्ड कश्मीर अवेयरनेस फोरम’ (WKA) के संस्थापक और अध्यक्ष के तौर पर काम शुरू किया। WKA की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक डॉ. मीर प्रेसीडेंट के पद पर कार्यरत हैं। इसके अलावा WKA के सोशल मीडिया हैंडल्स मौजूद हैं। जब हमने WKA के एक्स हैंडल (पूर्व ट्विटर) पर अबाउट सेक्शन में लोकेशन को देखा तो पाया कि इस अकाउंट का संचालन पाकिस्तान से होता है। वहीं हमने यह भी पाया कि गुलाम नबी फाई नामक एक शख्स ने खुद को ‘वर्ल्ड कश्मीर अवेयरनेस फोरम’ (WKA) का महासचिव बताया है। गुलाम नबी फाई पूरी दुनिया में ISI एजेंट के तौर पर कुख्यात है।

4. कौन है गुलाम नबी फाई?
गुलाम नबी फाई का नाम लंबे समय से कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय लॉबिंग से जुड़ा रहा है। वे विशेष रूप से अमेरिकी नीति-निर्माताओं, थिंक टैंक्स और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर से संबंधित विमर्श को प्रभावित करने की कोशिशों के लिए जाने जाते रहे हैं। हालांकि, उनकी गतिविधियों को लेकर समय-समय पर गंभीर सवाल भी उठते रहे हैं, खासकर जांच एजेंसियों और विश्वसनीय मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर।
वर्ष 2011 में Federal Bureau of Investigation (FBI) द्वारा किए गए खुलासों ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया। जांच के दौरान यह आरोप सामने आया कि फाई Kashmiri American Council के माध्यम से कथित तौर पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के इशारों पर काम कर रहे थे। जांच में यह भी कहा गया कि फाई ने अमेरिकी कानूनों का उल्लंघन करते हुए विदेशी फंडिंग और अपने वास्तविक संपर्कों को छिपाने का प्रयास किया। आरोपों के मुताबिक, वे कश्मीर मुद्दे को एक विशेष दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने के लिए सेमिनार, कॉन्फ्रेंस और लॉबिंग गतिविधियों का आयोजन करते थे, जिनका उद्देश्य अमेरिकी नीति-निर्माताओं और जनमत को प्रभावित करना था। इन खुलासों के बाद फाई को गिरफ्तार किया गया और बाद में उन्होंने अदालत में आरोपों को स्वीकार भी किया।

5. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI से कनेक्शन!
कानूनी दस्तावेजों और बाद की जांचों से यह भी सामने आया कि फाई ने अंतरराष्ट्रीय मंचों, कॉन्फ्रेंसों और अभियानों का इस्तेमाल कश्मीर पर एकतरफा और प्रायोजित नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए किया। इंडिया टुडे की 9 दिसंबर 2011 की रिपोर्ट के मुताबिक नए कोर्टी दस्तावेजों से पता चलता है कि अलगाववादी सैयद गुलाम नबी फाई और उनकी कश्मीरी अमेरिकन काउंसिल (केएसी) पूरी तरह से आई एसआई के नियंत्रण में थी, और पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी के विस्तार के रूप में काम कर रहे थे ताकि अमेरिकी सांसदों, अधिकारियों और विचारों को कश्मीर पर अपने दृष्टिकोण के बारे में आश्वस्त किया जा सके। फाई को आई एसआई के लिए जासूसी करने, कश्मीर पर अमेरिकी नीति को प्रभावित करने और आई एसआई से गुप्त रूप से धन प्राप्त करने के संघीय आरोपों में दोषी ठहराया गया।

पूर्व पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के साथ फाई के संबंध!
गुलाम नबी फाई का नेटवर्क पाकिस्तान के उच्च राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों तक जुड़ा हुआ था। विशेष रूप से, पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के साथ उनके संबंधों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। एक मीडिया रिपोर्ट में फाई को ISI समर्थित नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख चेहरों में बताया गया है, जो राजनीतिक समर्थन और रणनीतिक समन्वय के जरिए वैश्विक स्तर पर कश्मीर को एक विशेष दृष्टिकोण से पेश करने में लगे थे। इन कड़ियों से यह संकेत मिलता है कि फाई की गतिविधियां केवल व्यक्तिगत पहल नहीं थीं, बल्कि एक व्यापक नेटवर्क और राजनीतिक समर्थन के साथ संचालित हो रही थीं।

पाकिस्तान सरकार का प्रिय रहा है गुलाम नबी फाई
यहां दिए गए ग्राफ की टाइमलाइन दरअसल उन परतों को सामने लाती है, जिनके माध्यम से गुलाम नबी फाई का नाम वर्षों से पाकिस्तान के शीर्ष राजनीतिक और कूटनीतिक नेतृत्व के साथ जुड़ा हुआ है। इस टाइमलाइन में वर्ष 2009 से लेकर 2024 तक के विभिन्न बिंदुओं को रेखांकित किया गया है। वर्ष 2009 में तत्कालीन राष्ट्रपति Asif Ali Zardari से फाई की मुलाकात का उल्लेख इस नेटवर्क की शुरुआती झलक पेश करता है। इसके बाद अलग-अलग वर्षों में पाकिस्तान के विभिन्न राजनीतिक और कूटनीतिक चेहरों के साथ फाई के संबंधों या संपर्कों के दावे भी सामने आते रहे हैं, जो यह संकेत देते हैं कि फाई की पहुंच केवल एक सीमित दायरे तक नहीं रही।
टाइमलाइन का सबसे हालिया बिंदु वर्ष 2024 में वर्तमान प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ तक संभावित पहुंच को दर्शाता है। फाई की यह गतिविधियां इस बात की ओर इशारा करती हैं कि वह एक लंबे समय से सक्रिय और संगठित लॉबिंग ढांचे का हिस्सा हो सकते हैं, जो कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव डालने की कोशिश करता रहा है।

2019 में न्यूयॉर्क में इमरान खान और शाह महमूद कुरैशी के साथ उनकी मौजूदगी इस बात की ओर इशारा करती है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर को लेकर एक समन्वित नैरेटिव आगे बढ़ाया जा रहा था। इसके बाद 2020 और 2021 में लगातार संपर्क और मंच साझा करना इस नेटवर्क की निरंतरता को और मजबूत करता है। सबसे अहम बात यह है कि यह सिलसिला रुकता नहीं, बल्कि 2024 तक सक्रिय दिखाई देता है। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या फाई की भूमिका केवल व्यक्तिगत विचार व्यक्त करने तक सीमित थी, या फिर वह एक बड़े, संगठित और राज्य-समर्थित नैरेटिव तंत्र का हिस्सा थे, जो वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालने की कोशिश कर रहा है।

6. भारत विरोधी प्रोपेगेंडा का इकोसिस्टम इल्यूजन
‘Saffron Kingdom’ का प्रमोशन केवल एक फिल्म प्रचार तक सीमित नहीं था, बल्कि इसे एक संरचित संस्थागत और बौद्धिक नेटवर्क के माध्यम से आगे बढ़ाया गया। इस नेटवर्क में व्यक्तियों, अकादमिक चेहरों और एडवोकेसी संगठनों की संयुक्त भागीदारी दिखाई देती है। सबसे प्रमुख भूमिका Muslim Public Affairs Council (MPAC) की रही, जिसने फिल्म की स्क्रीनिंग को न केवल होस्ट किया, बल्कि इसे एक वैचारिक कार्यक्रम के रूप में प्रस्तुत किया। MPAC ने Daffodil Studios और Islamic Center of Southern California के साथ मिलकर इस फिल्म को “कश्मीर की सच्चाई” और “ग्लोबल नैरेटिव” के संदर्भ में पेश किया।
दूसरी ओर, खालिद बेयदून जैसे प्रोपेगेंडा के माहिर खिलाड़ी की उपस्थिति भी यह दर्शाती है कि फिल्म को कथित तौर पर कानूनी, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय विमर्श के साथ जोड़कर किसी खास एजेंडे के तहत किया गया है। खालिद बेयदून पर DFRAC की टीम ने विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित किया है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं। यह पूरा सिस्टम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक संगठित गिरोह की तरह काम कर रहा था, इसलिए अमेरिका से बाहर यूके में इस फिल्म को प्रमोट फहीम कयानी ने किया, जो ऑल पार्टीज़ कश्मीर अलायंस UK और तहरीक-ए-कश्मीर UK के अध्यक्ष हैं और लंबे समय से भारत के खिलाफ नरेटिव बनाने के खेल में शामिल हैं। अगर समग्र रूप से देखा जाए तो यह पूरा इकोसिस्टम—संस्थान, अकादमिक और एक्टिविस्ट—मिलकर फिल्म के प्रमोशन का इकोसिस्टम इल्यूजन बनता है।

निष्कर्षः
फिल्म ‘Saffron Kingdom’ को केवल एक फिल्म के रूप में नहीं, बल्कि भारत-विरोधी और कश्मीर केंद्रित प्रोपेगेंडा नैरेटिव को आगे बढ़ाने के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल किया गया। Daffodil Studios के नेतृत्व में, गुलाम नबी मीर, वर्ल्ड कश्मीर अवेयरनेस फोरम और गुलाम नबी फाई जैसे जुड़े नामों के माध्यम से इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाया गया। साथ ही Muslim Public Affairs Council, अकादमिक और एक्टिविस्ट नेटवर्क के जरिए इस फिल्म को एक विशेष राजनीतिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया गया, जो वैश्विक स्तर पर भारत की छवि और कश्मीर मुद्दे को प्रभावित करने की कोशिश करता हुआ प्रतीत होता है।

