Targeted information war

डिजिटल दुष्प्रचार का नया पैटर्नः भारतीय सेना और अधिकारियों के खिलाफ टारगेटेड इन्फॉर्मेशन वार!

Featured Hate MONITOR Report

डिजिटल संचार के तीव्र विस्तार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की बढ़ती पहुंच ने सूचना-परिदृश्य को अभूतपूर्व रूप से परिवर्तित किया है। इस परिवर्तित परिदृश्य में सूचना-युद्ध, संज्ञानात्मक युद्ध और प्रभाव अभियानों ने आधुनिक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैचारिक संघर्षों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। विभिन्न अध्ययनों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा यह रेखांकित किया गया है कि दुष्प्रचार, भ्रामक सूचना और दुर्भावनापूर्ण सूचना का उपयोग केवल गलत तथ्यों के प्रसार तक सीमित नहीं है, बल्कि इनका उद्देश्य सार्वजनिक विमर्श, सामूहिक धारणाओं और संस्थागत वैधता को प्रभावित करना भी होता है। संदर्भ-विहीन सामग्री, भ्रामक दृश्य सामग्री, गलत पहचान, चयनात्मक प्रस्तुति तथा नैरेटिव इंजीनियरिंग जैसी तकनीकों के माध्यम से लक्षित सूचना अभियानों को संचालित किया जाता है।

सुरक्षा एवं सामरिक अध्ययन के क्षेत्र में यह माना जाता है कि सशस्त्र बलों जैसी संस्थाओं के विरुद्ध संचालित दुष्प्रचार अभियान केवल प्रतिष्ठा को प्रभावित करने का प्रयास नहीं होते, बल्कि वे संस्थागत विश्वास, नागरिक-सैन्य संबंधों और राष्ट्रीय सुरक्षा विमर्श को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसी संदर्भ में हाल के वर्षों में भारतीय सेना और उसके अधिकारियों से संबंधित अनेक प्रकार के डिजिटल दुष्प्रचार पैटर्न सामने आए हैं। कई मामलों में विदेशी अथवा असंबंधित घटनाओं के वीडियो और तस्वीरों को भारतीय सेना के अधिकारियों अथवा जवानों से जोड़कर प्रस्तुत किया गया, जबकि कुछ मामलों में सेना अधिकारियों के वक्तव्यों को संदर्भ से हटाकर, चयनात्मक उद्धरणों अथवा विकृत व्याख्याओं, डिजिटली अल्टर्ड बयानों को प्रसारित किया गया। इसके अतिरिक्त, सेना और नागरिकों के बीच कथित संघर्ष, सेना और सरकार के बीच मतभेद, सेना द्वारा अपने ही जवानों के दमन तथा पड़ोसी देशों के साथ तनाव को बढ़ाने वाले नैरेटिव भी डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर व्यवस्थित रूप से प्रसारित होते रहे हैं। सेना और अधिकारियों के खिलाफ इस प्रकार के दुष्प्रचार नैरेटिव में पड़ोसी देश पाकिस्तान से संचालित होने वाले सोशल मीडिया हैंडल्स की भूमिका काफी संदेहास्पद है।

यह रिपोर्ट भारतीय सेना अधिकारियों के विरुद्ध उभरते डिजिटल दुष्प्रचार के प्रमुख पैटर्नों और नैरेटिव संरचनाओं का विश्लेषण प्रस्तुत करती है। रिपोर्ट में विशिष्ट वायरल दावों अथवा घटनाओं का तथ्यात्मक परीक्षण किया गया है और उन व्यापक सूचना-रणनीतियों, फ्रेमिंग तकनीकों और प्रभाव तंत्रों को समझने का प्रयास भी किया गया है, जिनके माध्यम से सेना और उसके अधिकारियों की सार्वजनिक छवि को प्रभावित करने, संस्थागत विश्वसनीयता को कमजोर करने तथा जनमत को प्रभावित करने के प्रयास किए जाते हैं। इस रिपोर्ट के प्रमुख बिन्दू इस प्रकार हैं-

  1. भारतीय सेना और नागरिकों के बीच संघर्ष का झूठा नरेटिव
  2. सेना और सरकार के बीच विरोधाभास का प्रोपेगेंडा
  3. सेना अधिकारियों के बयानों तोड़-मरोड़कर पेश करना
  4. फेक/भ्रामक सूचनाओं से अधिकारियों की छवि धूमिल का प्रयास
  5. सेना का अपने ही जवानों के दमन का प्रोपेगेंडा
  6. पड़ोसी देशों से टकराव बढ़ाने के लिए दुष्प्रचार

1- भारतीय सेना और नागरिकों के बीच संघर्ष का झूठा नरेटिवः

किसी भी देश की सेना को उसकी सबसे विश्वसनीय संस्थाओं में से एक माना जाता है। हालांकि, सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के साथ सेना और नागरिकों के बीच कथित संघर्ष को दर्शाने वाले भ्रामक दावे, फर्जी वीडियो और संदर्भ-विहीन सामग्री का प्रसार भी बढ़ा है। अनेक मामलों में पुरानी वीडियो फुटेज अथवा असंबंधित घटनाओं को भारतीय सेना की कार्रवाई बताकर प्रसारित किया जाता है। ऐसे दुष्प्रचार अभियानों के प्रसार में कई विदेशी स्रोतों, सीमा-पार नेटवर्कों तथा भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने वाले सोशल मीडिया हैंडल्स की सक्रिय भूमिका देखी गई है। इस तरह की भ्रामक सूचनाएं भारत के विभिन्न राज्यों खासतौर पर जम्मू-कश्मीर, पंजाब और नॉर्थ-ईस्ट में होने वाली घटनाओं की आड़ में किया जाता है। जैसे- मणिपुर के मौजूदा हालात में सेना द्वारा नागरिकों का दमन किए जाने के कई भ्रामक और फेक सूचनाएं फैलाई गई हैं, जिसमें ‘मणिपुर पोस्ट’ और ‘जर्द सी गना’ नामक यूजर्स ने कभी सेना के हमले में 500 नागरिकों की मौत, तो कभी 200 नागरिकों की मौत की फेक न्यूज फैलाई गई। इसके अलावा यह भी फेक न्यूज खूब शेयर किया गया कि मणिपुर में स्थानीय लोगों ने भारतीय सेना को अपने इलाके में घुसने नहीं दिया।

फैक्ट चेकः 1, 2, 3, 4, 5

कश्मीर में सेना का नागरिकों पर रासायनिक हथियारों के प्रयोग की झूठी सूचना भी इसी प्रोपेगेंडा का हिस्सा है। सेना की छवि को धूमिल करने के लिए उसे अल्पसंख्यक विरोधी, अत्याचारी, जुर्म और बर्बरियत करने वाला बताने के लिए सूचनाओं को इस तरह से फ्रेम किया जाता है, जिसमें सीधे तौर पर सेना को दोषी ठहराया जाता है। उदाहरण के तौर पर- ‘टैक्टिकल ट्रिब्यून’ नामक प्रोपेगेंडा अकाउंट ने पंजाब में सिख एक्टिविस्ट सिमरनजीत सिंह की हत्या मामले में सेना को दोषी ठहराया, जबकि पुलिस ने इस हत्याकांड में सिमरनजीत के चचेरे भाई शरणदीप सिंह को गिरफ्तार किया था। इसी प्रकार ‘स्टील्थ फैल्कोनर’ नामक यूजर ने जम्मू में पानी के लिए किए गए प्रदर्शन को सेना के खिलाफ प्रदर्शन का बताकर भ्रामक सूचना प्रसारित किया था। वहीं, ‘जर्द सी गना’ यूजर ने पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के दौरान बांग्लादेश में सेना का लोगों पर लाठीचार्ज किए जाने के वीडियो को बंगाल में मुस्लिमों पर अत्याचार का बताकर शेयर किया गया था।

फैक्ट चेकः 1, 2, 3, 4

2- सेना और सरकार के बीच विरोधाभास का प्रोपेगेंडाः 

सोशल मीडिया पर कई भारतीय सेना के उच्च अधिकारियों के कुछ ऐसे कथित बयान शेयर किए जाते हैं, जिनको देखने से लगता है कि सेना और सरकार के बीच गंभीर मतभेद, असंतोष और टकराव है, लेकिन जब इन कथित बयानों की सच्चाई जानेंगे तो पाएंगे कि यह फेक और भ्रामक हैं और वास्तविकता में सेना के अधिकारियों ने ऐसा कोई नहीं दिया था। दरअसल कई ग्रुप सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और वह लगातार सैन्य अधिकारियों के फेक और डिजिटली अल्टर्ड बयानों को शेयर करते रहते हैं। इन दावों में अक्सर मनगढ़ंत उद्धरण, संदर्भ-विहीन वीडियो, भ्रामक अनुवाद और अधूरी सूचनाओं का उपयोग किया जाता है, जिससे एक कृत्रिम संस्थागत संघर्ष नैरेटिव निर्मित किया जा सके।

यहां हम कुछ पोस्टों को देखते हैं। ‘कश्मीर उर्दू’ नामक एक सोशल मीडिया हैंडल द्वारा दावा किया गया कि सेना के एक अधिकारी ने ऑपरेशन सिंदूर में मारे गए सैनिकों की संख्या को लेकर सरकार द्वारा कथित तौर पर गलत आंकड़े प्रस्तुत किए जाने के विरोध में इस्तीफा दे दिया है। पोस्ट में एक वर्दीधारी व्यक्ति का वीडियो शेयर कर उसे भारतीय सेना का अधिकारी बताया गया तथा दावा किया गया कि उसने सरकार पर तथ्यों को छिपाने का आरोप लगाया है। जांच में यह दावा भ्रामक पाया गया और वीडियो कथित इस्तीफे से कोई संबंध नहीं था। इसी तरह ‘जर्द सी गना’ ने एक अन्य पोस्ट में दावा किया कि भारतीय सेना के एक कारगिल युद्ध के दिग्गज अधिकारी ने भारतीय सेना की विफलताओं को उजागर करते हुए अधिकारियों को “मोदी का दलाल” कहा। इसके फैक्ट चेक में यह दावा निराधार पाया गया। ‘XaQil’ नामक यूजर के एक अन्य पोस्ट में तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी के नाम से एक कथित बयान वायरल किया गया, जिसमें केंद्र सरकार पर तालिबान को धन उपलब्ध कराने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। फैक्ट चेक में पाया गया कि थल सेनाध्यक्ष ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया था और उनका बयान डिजिटली अल्टर्ड था।

इन तीनों उदाहरणों को देखने पर पता चलता है कि दुष्प्रचार नेटवर्क सेना अधिकारियों की सार्वजनिक विश्वसनीयता का उपयोग कर राजनीतिक और संस्थागत अविश्वास पैदा करने का असफल प्रयास करते हैं। फर्जी उद्धरण, संदर्भ-विहीन वीडियो तथा मनगढ़ंत दावों के माध्यम से यह धारणा निर्मित करने की कोशिश की जाती है कि सेना के भीतर सरकार के प्रति असंतोष या विरोध मौजूद हैं।

फैक्ट चेकः 1, 2

3- सेना अधिकारियों के बयानों तोड़-मरोड़कर पेश करनाः

डिजिटल दुष्प्रचार के प्रमुख तरीकों में से एक सेना अधिकारियों के वास्तविक अथवा कथित बयानों को संदर्भ से काटकर, आंशिक रूप से प्रस्तुत कर या पूरी तरह मनगढ़ंत दावों के साथ प्रसारित करना है। हमारी जांच के दौरान ऐसे अनेक उदाहरण सामने आए, जिनमें भारतीय सेना, वायुसेना तथा सैन्य नेतृत्व से जुड़े अधिकारियों के डिजिटली अल्टर्ड बयानों या फिर वक्तव्यों को विकृत रूप में प्रस्तुत कर भ्रामक नैरेटिव गढ़ने का प्रयास किया गया। कुछ सोशल मीडिया हैंडल्स ने सैन्य अधिकारियों के नाम से ऐसे फेक और भ्रामक बयान प्रसारित किए, जिनमें दावा किया गया कि भारतीय सेना अपनी सैन्य रणनीतियों को लेकर असमंजस में है, सीमावर्ती क्षेत्रों में अभियानों को लेकर गंभीर मतभेद हैं, अथवा सैन्य नेतृत्व सरकार की नीतियों से असहमत है। कुछ मामलों में अधिकारियों के वास्तविक वीडियो या प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंशों को काटकर इस प्रकार शेयर किया गया कि उनके मूल संदर्भ और आशय पूरी तरह बदल गए। वहीं, कई पोस्टों में अधिकारियों के नाम से ऐसे कथन जोड़े गए, जिनका कोई आधिकारिक या विश्वसनीय स्रोत उपलब्ध नहीं था।

‘व्हिसल ब्लोकर’ नामक यूजर के एक पोस्ट में दावा किया गया कि एक सेना अधिकारी ने बयान दिया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने पेट्रोल से चलने वाले ड्रोन का इस्तेमाल किया, अगली बार डीजल वाले ड्रोन का इस्तेमाल करेंगे, जिससे ड्रोन के साउंड से भय पैदा होगा। जबकि फैक्ट चेक में दावा भ्रामक पाया गया। ‘टैक्टिकल ट्रिब्यून’ ने एक पोस्ट में दावा किया कि एक भारतीय अधिकारी ने बयान दिया पाकिस्तानी मिसाइल ने पठानकोट एयरबेस पर अपना टारगेट हिट किया था। जब इसका फैक्ट चेक किया गया, तो पाया गया कि सेना अधिकारी ऐसा बयान नहीं दिया था और उनका बयान डिजिटली अल्टर्ड था। इसके अतिरिक्त सेना प्रमुख और अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के नाम से भी कई भ्रामक पोस्ट प्रसारित किए गए। कुछ पोस्टों में अधिकारियों के वास्तविक बयानों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया गया, जबकि कुछ मामलों में अधिकारियों के नाम से ऐसे कथन जोड़े गए जो उन्होंने कभी दिए ही नहीं थे।

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4- फेक/भ्रामक सूचनाओं से अधिकारियों की छवि धूमिल का प्रयासः

विश्लेषण के दौरान हमने पाया कि भारतीय सेना के अधिकारियों और उनके परिवारों को विवादों, आपराधिक घटनाओं अथवा सामाजिक अस्वीकार्यता से जोड़ने के लिए भ्रामक एवं तथ्यहीन दावे प्रसारित किए गए। इन मामलों में वास्तविक घटनाओं को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करने, असंबंधित व्यक्तियों की पहचान बदलने तथा अपुष्ट आरोपों को सैन्य अधिकारियों से जोड़ने जैसी प्रोपेगेंडा और सूचना युद्ध तकनीकों का दुरुपयोग किया गया।

उदाहरण के तौर पर देखें तो ‘बाबा टोका’ नामक यूजर ने एक पोस्ट के माध्यम से दावा किया कि ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के पुत्र द्वारा पड़ोसियों के घर के बाहर कूड़ा फेंकने की घटना सामने आई है, जिसके बाद स्थानीय लोगों ने उसकी पिटाई कर दी। फैक्ट चेक में पाया गया कि वायरल पोस्ट में लगाए गए आरोपों के समर्थन में कोई विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध नहीं था तथा सैन्य अधिकारी को घटना से जोड़ने का दावा भ्रामक था। इस प्रकार की सामग्री का उद्देश्य सैन्य अधिकारी की व्यक्तिगत और सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना प्रतीत होता है। दूसरे मामले में ‘मणिपुर पोस्ट’ ने थाईलैंड में हुई एक मारपीट की घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया और दावा किया कि वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति भारतीय सेना का एक वरिष्ठ अधिकारी है। कुछ पोस्टों में उसे लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारी के रूप में भी प्रस्तुत किया गया। हालांकि फैक्ट चेक से स्पष्ट हुआ कि इसका भारतीय सेना अथवा किसी भारतीय सैन्य अधिकारी से कोई संबंध नहीं था। यह एक असंबंधित घटना थी, जिसे जानबूझकर भारतीय सेना के अधिकारी से जोड़कर प्रसारित किया गया।

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5- सेना का अपने ही जवानों के दमन का प्रोपेगेंडाः

हमारी जांच में ऐसे कई उदाहरण सामने आए, जिनमें भारतीय सेना के भीतर कथित असंतोष, पक्षपात, दमन अथवा आंतरिक संघर्ष का नैरेटिव गढ़ने के लिए सैन्य अधिकारियों और पूर्व सैन्य अधिकारियों के अन्य संदर्भ में दिए गए बयानों को डिजिटली अल्टर्ड कर भ्रामक तरीके से प्रस्तुत किया गया। इन मामलों में वास्तविक वक्तव्यों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत करना तथा मनगढ़ंत दावों के माध्यम से सेना की संस्थागत एकता पर प्रश्नचिह्न लगाने का प्रयास देखा गया। विश्लेषण के दौरान हमने ‘टैक्टिकल ट्रिब्यून’ के एक पोस्ट में पाया कि एक रिटायर्ड सैन्य जनरल ने नए थल सेनाध्यक्ष की नियुक्ति का विरोध किया है और भारतीय सेना में राजनीतिक हस्तक्षेप, परिवारवाद तथा लॉबिंग को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। कुछ सोशल मीडिया पोस्टों में उनके वक्तव्यों को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया मानो सेना के भीतर शीर्ष नेतृत्व को लेकर व्यापक असंतोष मौजूद हो। फैक्ट चेक में पाया गया कि लेफ्टिनेंट जनरल पी.आर. शंकर (रिटायर्ड) ने ईरान और अमेरिका के बीच समझौते तथा उसके भू-राजनीतिक प्रभावों पर चर्चा की थी। मूल वीडियो के अवलोकन से यह स्पष्ट हुआ कि उन्होंने भारतीय सेना प्रमुख या भारतीय सेना की क्षमता पर कोई टिप्पणी नहीं की थी। इसके अतिरिक्त, वायरल क्लिप के ऑडियो का AI-डिटेक्शन विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि वीडियो में प्रयुक्त आवाज AI-जेनरेटेड है।

वहीं, ‘जर्द सी गना’ के एक पोस्ट में दावा किया गया कि भारतीय सेना की कथित नाकामियों को उजागर करने और सरकार की आलोचना करने पर भारतीय सेना के कारगिल युद्ध के एक पूर्व सैनिक को गिरफ्तार कर लिया गया। फैक्ट चेक के दौरान हमने यह दावा भ्रामक पाया। वायरल वीडियो कांग्रेस नेता रामनाथ सिकरवार की है, जिनको यूपी विधानसभा घेराव के प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिया गया था। इन मामलों से स्पष्ट होता है कि दुष्प्रचार फैलाने वाले नेटवर्क अक्सर सेना के भीतर कथित विभाजन, असंतोष और दमन का नैरेटिव निर्मित करने का प्रयास करते हैं। इसके लिए पूर्व सैन्य अधिकारियों की सार्वजनिक पहचान और विश्वसनीयता का उपयोग किया जाता है, ताकि भ्रामक दावों को अधिक प्रामाणिक स्वरूप दिया जा सके।

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6- पड़ोसी देशों से टकराव बढ़ाने के लिए दुष्प्रचारः 

भारत के पड़ोसी देशों को लेकर भारतीय सैन्य अधिकारियों के ऐसे फेक, मनगढ़ंत, भ्रामक और आक्रामक बयान शेयर किए गए, जो पड़ोसी देशों को चुनौती देने, उनके खिलाफ युद्धोन्माद और टकराव को बढ़ावा देने वाले हैं। इस प्रकार के दुष्प्रचार अभियानों में सैन्य अधिकारियों की विश्वसनीयता का उपयोग करते हुए भड़काऊ, आक्रामक और कूटनीतिक रूप से संवेदनशील संदेशों को प्रसारित किया जाता है, जिससे क्षेत्रीय संबंधों को प्रभावित करने वाले नैरेटिव निर्मित किए जा सकें।

‘टैक्टिकल ट्रिब्यून’ के एक पोस्ट में भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई के एक वीडियो को शेयर करते हुए दावा किया गया कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि भारत एक साथ पाकिस्तान, चीन और तुर्किये के खिलाफ युद्ध लड़ सकता है तथा उन्हें इन देशों की कोई चिंता नहीं है। हालांकि फैक्ट चेक में पाया गया कि वायरल पोस्ट में राजीव घई का डिजिटली अल्टर्ड बयान शेयर किया गया था। वहीं ‘बालायत हुसैन’ नामक यूजर के एक अन्य पोस्ट में में भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी की तस्वीर के साथ बांग्ला भाषा में एक फेक बयान प्रसारित किया गया, जिसमें बांग्लादेश और भारत के संबंधों को लेकर उत्तेजक एवं विवादास्पद टिप्पणियां जोड़ दी गई थीं। फैक्ट चेक में पाया गया कि अधिकारी ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया था तथा वायरल सामग्री भ्रामक थी। इन दोनों मामलों का विश्लेषण दर्शाता है कि डिजिटल दुष्प्रचार नेटवर्क केवल घरेलू राजनीतिक या संस्थागत नैरेटिव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय संबंधों को प्रभावित करने वाले विषयों को भी निशाना बनाते हैं।

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निष्कर्षः

इस विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारतीय सेना और उसके अधिकारियों को निशाना बनाकर डिजिटल दुष्प्रचार का एक सुनियोजित पैटर्न संचालित किया जा रहा है। इस पैटर्न के अंतर्गत फर्जी उद्धरण, संदर्भ-विहीन वीडियो, भ्रामक अनुवाद, गलत पहचान तथा मनगढ़ंत दावों के माध्यम से सेना और नागरिकों के बीच संघर्ष, सेना-सरकार के बीच गतिरोध और मतभेद के फेक नरेटिव, सैन्य नेतृत्व के प्रति अविश्वास तथा पड़ोसी देशों के साथ तनाव के नैरेटिव गढ़े जाते हैं। इस तरह के मामलों से पता चलता है कि सूचना-युद्ध की ये रणनीतियां केवल गलत सूचना फैलाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सैन्य संस्थानों की विश्वसनीयता, सार्वजनिक विश्वास और राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित करने का प्रयास भी करती हैं।