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बुधवार, नवम्बर 30, 2022
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गांधी जी ने भगत सिंह को फांसी के फंदे पर लटकने के लिए छोड़ दिया था? पढ़ें, फ़ैक्ट-चेक 

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समाज और सोशल मीडिया पर रह रह कर ये दावा किया जाता रहा है कि गांधी जी ने आज़ादी के मतवाले भगत सिंह और उनके साथियों को अंग्रेज़ी क्रूरता के रहम-व-करम पर छोड़ दिया था।  

Roshan Singh Rajput नामक यूज़र ने ट्वीट किया, “यह वही गांधी है जिन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी के फंदे पे लटकने दिया आजादी के दीवानों को मरने के लिए छोड़ दिया ऐसे गांधी का जयंती क्यों मनाएं आज लाल बहादुर शास्त्री जयंती है، #लाल_बहादुर_शास्त्री_जयंती

दिवाकर चौहान ने ट्वीट कर सवाल किया,“भगत सिंह को क्यों नहीं बचाया गांधीजी ने पूछा है। भारत ।। वंदेमातरम्__rss” 

शैतान सिंह अंबेडकर नामक ट्विटर यूज़र ने लिखा,“नाथूराम गोडसे और महात्मा गांधी के बीच हम गांधी के साथ है। गांधी और बाबा साहब अंबेडकर के बीच हम अंबेडकर के साथ है। गांधी और भगत सिंह के बीच हम भगत सिंह के साथ है।”

वहीं अभिषेक उपाध्याय ने लिखा,“वामपंथियो की उलझनें भी ऐतिहासिक हैं। जैसे ही आप उनसे सावरकर और गांधी का जिक्र छेड़िए, वे गांधी का पांव पकड़ लेंगे और जैसे ही आप भगत सिंह की फाँसी न रोकने में गांधी की भूमिका व उसके चलते 1929 के कराची अधिवेशन में गांधी गो बैक के नारों का जिक्र करें, वे गांधी पर आँखें लाल कर लेंगे।”

इनके अलावा अलग अलग सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अनेक य़ूज़र्स ने भगत सिंह की फांसी के संदर्भ में गांधी जी के बारे में इसी से मिलते-जुलते प्रशनवाचक दावे किये हैं। 

फ़ैक्ट चेक:

DFRAC फ़ैक्ट चेक टीम ने उपरोक्त दावे की जांच-पड़ताल के कुछ की-वर्ड की मदद से इंटरनेट पर सर्च किया। टीम को अलग अलग मीडिया हाउसेज़ द्वारा पब्लिश कई रिपोर्ट्स मिलीं।

दैनिक भास्कर द्वारा शीर्षक, “क्या भगत सिंह को फांसी से बचा सकते थे:गांधी पर उठ रहे ऐसे 5 सवालों की कहानी” के तहत पब्लिश, रिपोर्ट के अनुसार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट एक्ट के विरोध के साथ आज़ादी की आवाज़ दुनिया तक पहुंचाने के लिए दिल्ली स्तिथ केंद्रीय असेंबली में दो बम फेंके और गिरफ्तारी भी दी। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 7 अक्टूबर 1930 को फांसी की सज़ा सुनाई गई और तय तारीख़ से एक दिन पहले 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई।

रिपोर्ट के अनुसार फांसी से 17 दिन पहले यानी 5 मार्च 1931 को वायसराय लॉर्ड इरविन और गांधी जी के बीच हुए समझौते की प्रमुख शर्तों में हिंसा के आरोपियों को छोड़कर बाक़ी सभी सियासी क़ैदियों को रिहा किया जाना शामिल था। इसके अलावा भारतीय को समुद्र किनारे नमक बनाने का अधिकार, आंदोलन के दौरान इस्तीफा देने वालों की बहाली, आंदोलन के दौरान जब्त संपत्ति वापस किए जाने जैसी बातें शामिल थीं। इसके बदले में कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया और दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में जाने को राजी हो गई।

दैनिक भास्कर ने इतिहासकार एजी नूरानी की किताब The Trial of Bhagat Singh के हवाले लिखा है कि भगत सिंह को बचाने में गांधी ने आधे-अधूरे प्रयास किए। भगत सिंह की मौत की सज़ा को कम करके उम्र कैद में बदलने के लिए उन्होंने वायसराय से जोरदार अपील नहीं की थी।

रिपोर्ट के मुताबिक़ इतिहासकार और गांधी पर कई किताबों के लेखक अनिल नौरिया का कहना है कि गांधी ने भगत सिंह की फांसी को कम कराने के लिए तेज बहादुर सप्रू, एमआर जयकर और श्रीनिवास शास्त्री को वायसराय के पास भेजा था। अप्रैल 1930 से अप्रैल 1933 के बीच ब्रिटिश सरकार में गृह सचिव रहे हर्बर्ट विलियम इमर्सन ने अपने संस्मरण में लिखा है कि भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए गांधी के प्रयास ईमानदार थे और उन्हें कामचलाऊ कहना शांति के दूत का अपमान है।

दैनिक भास्कर

वहीं शीर्षक, “गांधी जी ने क्यों नहीं रोकी भगत सिंह की फांसी” के तहत बीबीसी द्वारा पब्लिश रिपोर्ट के अनुसार गांधी जी कहते हैं, “भगत सिंह और उनके साथियों के साथ बात करने का मौका मिला होता तो मैं उनसे कहता कि उनका चुना हुआ रास्ता ग़लत और असफल है। ईश्वर को साक्षी रखकर मैं ये सत्य ज़ाहिर करना चाहता हूं कि हिंसा के मार्ग पर चलकर स्वराज नहीं मिल सकता। सिर्फ़ मुश्किलें मिल सकती हैं। मैं जितने तरीकों से वायसराय को समझा सकता था, मैंने कोशिश की. मेरे पास समझाने की जितनी शक्ति थी। वो मैंने इस्तेमाल की। 23वीं तारीख़ की सुबह मैंने वायसराय को एक निजी पत्र लिखा जिसमें मैंने अपनी पूरी आत्मा उड़ेल दी थी।”

रिपोर्ट के अनुसार गांधी ने कहा,“भगत सिंह अहिंसा के पुजारी नहीं थे, लेकिन हिंसा को धर्म नहीं मानते थे। इन वीरों ने मौत के डर को भी जीत लिया था। उनकी वीरता को नमन है। लेकिन उनके कृत्य का अनुकरण नहीं किया जाना चाहिए। उनके इस कृत्य से देश को फायदा हुआ हो, ऐसा मैं नहीं मानता। खून करके शोहरत हासिल करने की प्रथा अगर शुरू हो गई तो लोग एक दूसरे के कत्ल में न्याय तलाशने लगेंगे।”

बीबीसी ने हिंदी ने अपनी रिपोर्ट में कुछ बुनियादी सवाल भी उठाए हैं कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम फेंका था तब मशहूर लेखक खुशवंत सिंह के पिता सर सोभा सिंह वहां मौजूद थे।

उन्होंने अदालत में भगत सिंह की पहचान की थी। इसलिए बाद के सालों में खुशवंत सिंह को नीचा दिखाने के लिए दक्षिणपंथी ताकतों ने ये भी कोशिश की कि खुशवंत सिंह के पिता की गवाही के कारण भगत सिंह को फांसी हुई। हक़ीकत में भगत सिंह को असेंबली सभा में बम फेंकने के लिए नहीं बल्कि सांडर्स की हत्या के मामले में फांसी की सज़ा सुनाई गई थी (जिससे सोभा सिंह का कोई लेना-देना नहीं था)। सबसे अजीब बात ये है कि भगत सिंह की फांसी में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सरकारी गवाह बने कई क्रांतिकारी साथियों की थी। (इनमें से एक जयगोपाल की ग़लती के कारण स्कॉट के बदले सांडर्स की मौत हुई थी) इतने सालों में भगत सिंह की फांसी के नाम पर गांधी जी (या सोभा सिंह) की निंदा की गई है, लेकिन भगत सिंह के ख़िलाफ़ गवाही देने वाली क्रांतिकारी साथियों की कभी निंदा नहीं होती क्योंकि इससे राजनीतिक फायदा नहीं होता।

13 मई 2018 की द् ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने बीदर के रैली को संबोधित करते हुए सवाल किया था कि क्या कोई कांग्रेसी नेता भगत सिंह से जेल में मिलने गया था? 

द् ट्रिब्यून की रिपोर्ट में बताया गया है कि कांग्रेस ने भगत सिंह डिफेंस कमेटी बनाई थी। 9 अगस्त, 1929 को सामने आई एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि नेहरू, कांग्रेस नेता डॉ गोपी चंद (एमएलसी) के साथ, 8 अगस्त को लाहौर सेंट्रल एंड बोरस्टल जेल का दौरा किया और विरोध प्रदर्शन करने वालों का साक्षात्कार लिया। नेहरू ने ‘द ग्रेट सैक्रिफाइस मे बियर फ्रूट’ शीर्षक से एक बयान जारी किया, जो 10 अगस्त, 1929 को द ट्रिब्यून में छपा, जिसमें उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को जबरदस्ती खिलाने की कोशिश करने के लिए जेल अधिकारियों की आलोचना की।

thecrediblehistory.com की रिपोर्ट के अनुसार- “ट्रिब्यूनल में जब उनके पिता ने क़ानूनी सहायता के लिए डिफेन्स कमेटी बनाई तो भगत ने इसका तीख़ा विरोध किया था। अपने लिए किसी माफ़ी की जगह उन्होंने साफ़ कहा था कि हमने ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा है तो हमें युद्धबंदियों की तरह गोली मारी जाए। किसी भी क्षमायाचना के वह पूरी तरह से ख़िलाफ़ थे। वह सावरकर तो थे नहीं कि जेल और फाँसी के डर से माफ़ी मांग लेते या अपने विचार बदल लेते। सवाल यह भी है कि अहिंसा को जीवन भर धर्म की तरह पालित करने वाले गांधी ऐसी शर्त कैसे रख सकते थे? सिर्फ़ मानवीय आधार पर गांधी भगत सिंह की फाँसी की सज़ा माफ़ कराने की कोशिश कर सकते थे और इस आधार पर उन्होंने कोई कसर न छोड़ी।”

रिपोर्ट के अनुसार “इर्विन ने अपने संस्मरण में लिखा है –गांधी ने कहा कि उन्हें डर है कि अगर भगत सिंह के मृत्युदंड के बारे में मैंने कुछ नहीं किया तो समझौता टूट सकता है। मैंने कहा इसका दुःख मुझे भी होगा लेकिन मेरे लिए यह बिलकुल असंभव है कि भगत सिंह के मृत्युदंड के मामले में कोई छूट दे सकूँ”

वहीं की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार नेहरू की भतीजी मनमोहिनी सहगल,  भगत सिंह की फांसी की सज़ा के विरोध में आंदोलन किया, जिसके कारण उन्हें गिरफ़्तार कर जेल  भेज दिया गया। 

निषकर्ष: 

DFRAC के इस फ़ैक्ट-चेक से स्पष्ट है कि गांधी जी ने भगत सिंह की फांसी रुकवाने की भरपूर कोशिश की थी। कांग्रेस ने एक कमेटी बनाई थी, इसलिए सेशल मीडिया यूज़र्स द्वारा किया जा रहा दावा भ्रामक है। 

दावा: गांधी जी ने भगत सिंह को फांसी के फंदे पर लटकने के लिए छोड़ दिया

दावाकर्ता: सोशल मीडिया यूज़र्स

फ़ैक्ट चेक: भ्रामक

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