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सोमवार, जून 27, 2022
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फैक्ट चेक: क्या मोदी सरकार में बेरोजगारी के चरम पर पहुंच गई है? 

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देश में इन दिनों बेराजगारी और महंगाई को लेकर बहस हो रही है। सोशल मीडिया पर इस बहस में कई लोग तथ्यपरक बातें करते हैं, तो कई लोग तथ्यहीन बातें करते हैं। इंटरनेट पर एक ग्राफिकल तस्वीर वायरल हो रही है, जिसमें जनवरी-मार्च 2020 से जुलाई-सितंबर 2021 तक बेरोजगारी दर लिखा गया है। सोशल मीडिया यूजर्स इस ग्राफिकल फोटो को रोजगार देने में मोदी सरकार की विफलता के खिलाफ अपना आंदोलन दिखाने के लिए पोस्ट कर रहे हैं।

फेसबुक पर राहुल गांधी फैन्स नाम के एक पेज ने भी यही तस्वीर पोस्ट की। इस पेज ने फोटो शेयर करते हुए लिखा- बेरोजगारों की फौज खड़ी करके भारत विश्वगुरु बनेगा मोदी जी?

फैक्ट चेकः

बेरोजगारी दर को लेकर वायरल हो रहे इस ग्राफिकल फोटो की जांच की गई। भारत में NSSO (नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन) हर 5 साल में सर्वे करता है। यह 1972-73 से रोजगार और बेरोजगारी दर पर डेटा एकत्र करता है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) को रोजगार और बेरोजगारी के मापन के साथ दो प्रमुख उद्देश्यों के साथ डिजाइन किया गया था।

पहला, करेंट विकली स्टेटस (सीडब्ल्यूएस) में केवल शहरी क्षेत्रों के लिए तीन महीने के कम समय अंतराल में श्रम बल की भागीदारी और रोजगार की स्थिति में गतिशीलता को मापना। दूसरा, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के लिए, सामान्य स्थिति (पीएस + एसएस) और सीडब्ल्यूएस दोनों में प्रमुख मापदंडों पर श्रम बल के अनुमानों को मापने के लिए था।

ग्राफिकल पोस्टर में किया गया दावा कुछ हद तक सही है, लेकिन इसे पूरी तरह से सही नहीं माना जा सकता है। चूंकि इस डेटा में तिमाही जनवरी-मार्च 2020 (COVID-19 लॉकडाउन से पहले की तिमाही) की तुलना जुलाई-सितंबर 2021 तिमाही से की गई है, जो कि शुरुआती लॉकडाउन के बाद की है।

हाल ही में PSLF ने अपना ताजा डाटा जारी किया है। बेरोजगारी दर 2017-18 में 6.1% से घटकर 2019-20 में 4.8% हो गई। पिछले कुछ वर्षों में पुरुष बेरोजगारी दर 6.2% से घटकर 5.1% और महिला बेरोजगारी दर 5.7% से घटकर 4.2% हो गई।

2020 में शुरुआती लॉकडाउन और COVID-19 की दूसरी लहर ने बेरोजगारी दर को प्रभावित किया है। इस अवधि के दौरान बेरोजगारी दर उच्च थी।

पूरा लेख, विवरण के साथ नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

https://factly.in/plfs-data-unemployment-rate-remains-unchanged-between-2017-18-2019-20-according-to-the-cws-approach/

इस फैक्ट चेक से साबित होता है कि वायरल ग्राफिकल पोस्टर पूरी तरह से सत्य नहीं है, क्योंकि इसमें लॉकडाउन के परिदृश्य पर विचार नहीं किया गया है।

दावाः मोदी के शासन में बेरोजगारी दर 2020-2021 में बढ़ी

दावाकर्ताः सोशल मीडिया यूजर्स

फैक्ट चेक: भ्रामक

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