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Youtube का सख्त फैसला, स्वास्थ्य संबंधी गलत सूचना पर अपनी नीति में किया बदलाव

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29 सितंबर, 2021 को, Google के स्वामित्व वाले वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म YouTube ने स्वास्थ्य और विशेष रूप से वैक्सीन से संबंधित गलत सूचनाओं से लड़ने के लिए अपने कम्यूनिटी गाइडलाइन में संशोधन किया। COVID-19 महामारी की शुरुआत में Twitter, Facebook और YouTube भ्रामक सूचनाओं को अपने प्लेटफार्म से हटाने का निर्णय लिया था।
ताजा मामले में YouTube ने इन अपने दिशा-निर्देशों का एक वीडियो भी जारी किया ताकि यह समझाया जा सके कि वास्तव में ऐसा क्यों किया जा रहा है। अब, महामारी से संबंधित गलत सूचनाओं के अलावा, प्लेटफार्म पर वैक्सीन, उसकी प्रभावकारिता, उनके दुष्प्रभावों और सुरक्षा से संबंधित सभी गलत सूचनाओं को हटाया जाएगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैश्विक स्तर पर प्रशासित टीकों के अनुमोदन का हवाला देते हुए, YouTube अब वैक्सीन की मार्फत गलत सूचना को बढ़ावा देने वाले चैनलों को हटाना शुरु कर दिया है।

यह व्यापक रूप से ज्ञात है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने दुनिया भर में वैक्सीन को लेकर हिचकिचाहट को प्रोत्साहित किया है, इसमें अमेरिका के यूजर्स भी शामिल हैं. जानकारी के लिये बता दें कि राष्ट्रपति जो बिडेन ने भी वैक्सीन की हिचकिचाहट के लिये सोशल मीडिया को जिम्मेदार ठहराते हुए इस पर चिंता व्यक्त की थी।

अन्य विकसित देशों की तुलना में अमेरिका में वैक्सीन दरों में काफी कमी आई है। यहां तक कि ऐतिहासिक रूप से न्यू यॉर्क जैसे डेमोक्रेट राज्य हाल ही में इसलिये खबरों में रहा क्योंकि राज्य के अधिकारियों द्वारा दिए गए अनिवार्य टीकाकरण नीति के आदेश के कारण नर्सों ने इस्तीफा देना शुरू कर दिया था।
अमेरिका स्थित सेंटर फॉर काउंटरिंग डिजिटल हेट (सीसीडीएच) ने ऐसे 12 मुख्य अकाउंट्स की पहचान की है जो वैक्सीन को लेकर गलत सूचना को बढ़ावा दे रहे थे। इस समूह में रॉबर्ट एफ कैनेडी के बेटे रॉबर्ट एफ कैनेडी जूनियर शामिल भी हैं, जो जोसेफ मर्कोला के साथ-साथ वैक्स-विरोधी वर्ग में सबसे लोकप्रिय चेहरों में से रहे हैं। इस नई नीति का मतलब है कि ये चैनल अब YouTube द्वारा बंद कर दिए जाएंगे।
फेसबुक जैसे अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म इस तरह की सख्त नीति को लागू करने से हिचकिचाते रहे हैं, इसके पीछे इन सोशल साइट्स का तर्क है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप देता है। अब माना जा रहा है कि इसमें भी अब जल्द ही बदलाव शुरू हो सकता है। इसकी एक वजह यह भी है कि इन साइट्स को सांसदों और आम नागरिकों ने नोटिस करना शुरू कर दिया है।
इन प्लेटफार्मों पर खतरनाक सामग्री के नियमन की दिशा में यह एक अच्छा कदम है, चूंकि यह एक सार्वभौमिक नीति नहीं है, जो लोग YouTube पर प्रतिबंधित हो जाते हैं, वे अपने संदेशों को प्राप्त करने के लिए टेलीग्राम और अन्य जैसे अन्य प्लेटफार्मों पर बहुत अच्छी तरह से स्थानांतरित हो सकते हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत में इस नीति को कैसे लागू किया जाता है क्योंकि कई प्रभावशाली और छद्म-धार्मिक नेता COVID-19 और अन्य बीमारियों के खिलाफ गलत सूचना पोस्ट करने का सिलसिला जारी रखे हुए हैं। हाल ही में एक रिपोर्ट में पाया गया कि भारत सोशल मीडिया पर स्वास्थ्य संबंधी गलत सूचनाओं का एक शीर्ष स्रोत है।
भारत में भी आबादी का बहुत बड़ा वर्ग है जो व्हाट्सएप पर विश्वास करता है और वैक्सीन लेने से सख्ती से इनकार करता है। यह अभी भी COVID-19 टीकों तक सीमित है, लेकिन जल्द ही अन्य टीकों तक भी फैल सकता है। सेंटर फॉर काउंटरिंग डिजिटल हेट यूजर्स को हानिकारक गलत सूचनाओं से बचाने के लिए निम्नलिखित नीतियों को सूचीबद्ध करता है।

  • प्रवर्तन कार्रवाई के लिए एक स्पष्ट सीमा स्थापित करें
  • दुष्प्रचार के संपर्क में आने वाले यूजर्स के लिए सुधारात्मक पोस्ट प्रदर्शित करें
  • जब यूजर फेक न्यूज़ साइटों के लिंक पर क्लिक करते हैं तो चेतावनी स्क्रीन जोड़ें
  • एक जवाबदेही एपीआई संस्थान स्थापित करें
  • निजी और गुप्त टीकाकरण विरोधी फेसबुक समूहों पर प्रतिबंध लगाएं
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