Skip to content Skip to sidebar Skip to footer

उईगर : चीनी ज़ुल्म से आहत पूरी जनजाति

उईगर मुसलमानों के बारे में बाक़ी मुस्लिम जगत में सबसे कम बात होती है। जबकि चीनी ज़ुल्म के शिकार इस समूह के अधिकांश लोग चीन अधिकृत ईस्ट तुर्किस्तान यानी शिनज़ियांग में बेहद परेशान हैं। चीन के सांस्कृतिक संहार की ख़बरें बहुत कम बाहर आती हैं मगर सच यह है कि ईस्ट तुर्किस्तान में चीन के अत्याचार के क़िस्से अंतहीन हैं।

सवा दस लाख किलोमीटर लम्बे तारिम किनारे पर बसे इस क़बीले ने दसवीं से 16वीं शताब्दी के बीच इस्लाम क़ुबूल करना शुरू किया। सोलहवीं शताब्दी तक पूरा क़बीला इस्लाम में आ गया और इन्होंने एक जनजाति के साथ साथ इस्लाम को आत्मसात कर लिया। आज भी उईगर मुसलमानों की 80 फ़ीसद आबादी तारिम किनारे पर बसती है। दूसरी सबसे बड़ी आबादी ईस्ट तुर्किस्तान यानी चीन अधिकृत शिनज़ियांग की राजधानी उरुम्क़ी में रहती है। उईगर की तीसरी बड़ी आबादी कज़ाख़स्तानन में रहती है। शरणार्थी के तौर पर तुर्की में इनकी बडी आबादी बसती है। बाक़ी उज़्बेकिस्तान, सऊदी अरब, किर्गिज़िस्तान, जापान, अमेरिका, स्वीडन और जॉर्डन में भी निवास करते हैं। चीन अधिकृत शिनज़ियांग यानी ईस्ट तुर्किस्तान में 1 करोड़ 28 लाख उईगर आबादी बसती है और शिनज़ियांग के बाहर इनकी लगभग पाँच लाख की आबादी अन्य देशों में बसती है जिसमें अकेले कज़ाख़स्तान में 2 लाख 23 हज़ार लोग रहते हैं।

Uyghur Population in Xinjiang

चीन ने ईस्ट तुर्किस्तान देश पर सन् 1955 में क़ब्ज़ा किया। इस क़ब्ज़े के विरोध में जब उईगर मुसलमानों ने विरोध किया तो चीन ने अपने सितम बढ़ा दिए। चीन को लगता है कि उईगर मुसलमानों के आक्रोश का कारण इस्लाम है जबकि चीन यह नहीं समझना चाहता कि अगर उईगर अपने देश की आज़ादी चाहते हैं और उनको इस्लाम से प्रेरणा मिल रही है तो तिब्बती अपने देश की आज़ादी की माँग कर रहे हैं तो उनको प्रेरणा कहाँ से मिल रही है? ज़ाहिर है यह चीन के अतिवाद से मुक्ति और अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता की माँग है।

चीन उईगर मुसलमानों की मानसिकता को बदलना चाहता है मगर उसके कारण को नहीं समझना चाहता। चीन अपने पाप नहीं देखता, उसे उईगर सुधारने हैं। मानसिकता सुधार केन्द्र में वह उईगर मुसलमानों को लगभग क़ैदियों की तरह रखता है। उसे इस्लामी विश्वास के विपरीत सूअर खाने और शराब पीने के लिए मजबूर किया जाता है। रमज़ान में रोज़े रखने पर पाबंदी लगा देता है और नमाज़ पढ़ने से रोकता है। चीन यह समझ ही नहीं रहा कि ऐसी हरकतों के बाद निश्चित ही वह इस्लाम से प्रेरित होकर अपने देश की स्वतंत्रता के लिए और संघर्ष करेगा।

जिसे पूरी दुनिया उईगर मुसलमानों की जेल कहता है, चीन उसे ‘हिरासती कैम्प’ कहता है। इन खुली जेलों को ‘व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण केन्द्र’ भी कहा जाता है। मगर पूरी दुनिया जानती है कि यह खुली जेलें हैं जहां उईगर मुसलमानों के इस्लामी विश्वास की मज़ाक़ उड़ाते हुए रात दिन उनसे बिना मुआवज़ा बंधुआ मज़दूरों की तरह मेहनत करवाई जाती है। आज 10 लाख उईगर इन खुली जेलों में चीन की बेगारी करते हैं। शराब पीने और सूअर खाने पर मजबूर किए जाते हैं। जो इन कैम्पों से बाहर हैं वहाँ उईगर मुसलमान औरतों की ज़बरदस्ती चीनी हान जनजाति के मर्दों से शादियाँ करवाई जाती हैं। हान बस्तियां ईस्ट तुर्किस्तान में बसाई जा रही हैं ताकि इलाक़े की डेमोग्राफ़ी को बदला जा सके।

चीन के यह हिरासती कैम्प किसी भी जहन्नुम से कम नहीं। चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी महासचिव होने के नाते साल 2017 में शी जिनपिंग ने इन कैम्पों को बनाने की मान्यता दी थी। उईगर तो इन कैम्पों में बहुसंख्या में हैं इसके अलावा जो भी अन्य मुस्लिम जनजातियाँ हैं उन्हें भी बिना मुक़दमा और रिपोर्ट के यहाँ लाकर कभी भी ठूँस दिया जाता है। तुर्क मुसलमान और कज़ाख़स्तानी ईसाई भी उईगर के साथ क़ैद हैं। अमेरिकी एजेंसी ‘भारतीय महाद्वीप सुरक्षा मामलात समिति’ के रक्षा उप प्रमुख रैंडेल श्रीवर की एक रिपोर्ट में कहा गया कि 10 से 30 लाख उईगर और अन्य धार्मिक जनजाति अल्पसंख्यक लोग इन कैम्पों में क़ैद हैं। अगस्त 2018 में ‘नस्लीय भेदभाव मिटाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की समिति’ के अमेरिकी प्रतिनिधि गेल मैकडॉल ने कहाकि हमें कई विश्वसनीय सूत्रों से जानकारी है कि इन कैम्पों में 10 लाख उईगर मुसलमानों को क़ैद करके रखा गया है। वर्ष 2019 में चीन समेत 54 देशों ने चीन पर आरोपों को निरस्त कर दिया जबकि 23 देशों ने चिन्ता जताई। साल 2019 में चीन को जायज़ मानने वाले 16 देशों ने बाद में अपनी राय बदल दी।

चीन सभी उईगर मुसलमानों के घर के पते और फोन नम्बर ही नहीं, ख़ून की रिपोर्ट, आँखों की आइरिस का फोटो, फिंगर प्रिंट और आवाज़ के सैम्पल जमा कर रहा है। हर उईगर की कार पर जीपीएस लगाया जाता है ताकि उसका मूवमेंट पता किया जा सके। हज़ारों उईगर को पुलिस पूछताछ के लिए लेकर गई लेकिन उनका कोई अता पता नहीं है। मुसलमानों की जान पर राजनीति करने वाले पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के उस दस्तावेज़ पर चीन का समर्थन किया जो उईगर लोगों पर अत्याचार बताने के लिए तैयार किया गया। नेपाल, श्रीलंका, रूस, बेलारूस, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान भी चीन की शिनजियांग कार्रवाइयों को जायज़ मानता है। मलेशिया, थाईलैंड और कम्बोडिया ने तो चीन के कहने पर उन उईगर लोगों को वापसी चीन भेज दिया जिनकी माँग चीन ने की थी। इसी साल मार्च में तुर्की की संसद ने उईगर लोगों के नरसंहार के लिए लाए गए निंदा प्रस्ताव को रोक दिया। तुर्की के राष्ट्रपति तैयब इरदोगान को मुसलमानों का मसीहा बनने का सपना है लेकिन वह ईस्ट तुर्किस्तान पर चीन के क़ब्ज़े को भी जायज़ मानते हैं।