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दिल्ली प्रदर्शन की आड़ में पाकिस्तानी कर रहे भड़काऊ प्रोपेंगेंडा, जमकर फैला रहे फेक न्यूज!

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दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक मामले को लेकर आंदोलन जारी है। प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने संसद मार्च का आह्वान किया था, जिसके दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प भी हुईं, जिसके कई वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए, जिसके बाद इस मुद्दे ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर व्यापक चर्चा का रूप ले लिया। ऐसे घटनाक्रम अक्सर सूचना युद्ध और दुष्प्रचार अभियानों के लिए अवसर भी बन जाते हैं। इस मामले में भी यही पैटर्न देखने को मिला। झड़प के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर फेक, भ्रामक और संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत की गई सूचनाओं की बाढ़ आ गई। कहीं प्रदर्शनकारी की मौत का झूठा दावा किया गया, तो कहीं प्रदर्शन के कारण पुलिसकर्मी की मौत जैसी निराधार बातें प्रसारित की गईं। कई पुराने और असंबंधित वीडियो भी वर्तमान घटना से जोड़कर वायरल किए गए, जिससे भ्रम पैदा करने की कोशिश की गई।

DFRAC के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि इस दुष्प्रचार अभियान में कई पाकिस्तानी सोशल मीडिया हैंडल्स सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इन हैंडल्स ने ना सिर्फ अपुष्ट और भ्रामक सूचनाओं का प्रसार किया, बल्कि भारत में अराजकता, सरकारी दमन, सेना द्वारा दमन, सिविल वॉर और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विफलता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। इन पोस्टों में तथ्यात्मक जानकारी की बजाय भड़काऊ नैरेटिव को प्राथमिकता दी गई, ताकि अधिक से अधिक लोगों तक नकारात्मक संदेश पहुंचाया जा सके। यह पैटर्न दर्शाता है कि किसी घरेलू घटना को विदेशी प्रोपेगेंडा नेटवर्क द्वारा अपने एजेंडे के अनुरूप इस्तेमाल कर डिजिटल नैरेटिव को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। DFRAC की इस रिपोर्ट में ऐसे पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा हैंडल्स द्वारा फैलाए गए फेक और भ्रामक दावों, उनके भड़काऊ नैरेटिव और समन्वित डिजिटल गतिविधियों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इन यूजर्स में जर्द सी गना, व्हिसिल ब्लोअर, आइरिस रेकॉन, पाकिस्तानी मारखोर, इंटेल स्कोप और साउथ एशिया राइट्स वॉच जैसे प्रमुख अकाउंट्स हैं, जो लगातार भारत के मामलों पर प्रोपेगेंडा करते रहते हैं। इस रिपोर्ट के प्रमुख बिन्दू निम्नलिखित हैं-

  1. पीएम और मंत्रियों के फेक बयान जमकर वायरल
  2. आर्मी और पुलिस अधिकारियों के फेक बयानों की बाढ़
  3. भारतीय सेना के खिलाफ नकारात्मक प्रोपेगेंडा
  4. सेना और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव का फेक नरेटिव
  5. दिल्ली पुलिस ने 480 पाकिस्तानी यूजर्स पर कार्रवाई की

1. पीएम और मंत्रियों के फेक बयान जमकर वायरल

DFRAC के विश्लेषण में सामने आया कि दिल्ली प्रदर्शन को लेकर पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा हैंडल्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के नाम पर कई फर्जी बयान प्रसारित किए। इन पोस्टों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, किरेन रिजिजू और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कथित बयान वायरल किए गए, जबकि सार्वजनिक रिकॉर्ड में ऐसे किसी भी बयान का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

उदाहरण के तौर पर पीएम मोदी का एक बयान शेयर किया गया है कि “अगर हमने एक पेपर लीक कर दिया तो इन स्टूडेंट्स को क्या दिक्कत है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता?” फैक्ट चेक में पाया गया कि पीएम मोदी ऐसा कोई बयान दिया ही नहीं था। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ का एक बयान शेयर किया गया कि, “अगर वे छात्र विरोध-प्रदर्शन बंद नहीं करते हैं, तो चाहे कितनी भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े, राज्य की पूरी ताकत का इस्तेमाल किया जाएगा और इस विरोध-प्रदर्शन को खत्म कर दिया जाएगा।” राजनाथ का यह बयान भी डिजिटली अल्टर्ड था। इन पाक प्रोपेगेंडा यूजर्स ने पीयूष गोयल का फेक बयान काफी उत्तेजक तरीके से शेयर किया, जिसमें उन्हें यह कहते दिखाया गया है कि “हम 2 या 3 कॉकरोच को लटका देंगे ताकि बाकी कॉकरोच को ऐसा सबक मिले जिसे वे कभी न भूलें। बस इंतज़ार कीजिए और देखिए।” पीयूष गोयल की टीम ने DFRAC से कन्फर्म किया है कि उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया। इसी तरह से केंद्रीय मंत्री किरन रिजीजू और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के फेक और डिजिटली अल्टर्ड बयानों को भी काफी उत्तेजक तरीके से शेयर किया गया था।

फैक्ट चेकः 1, 2, 3, 4

2. आर्मी और पुलिस अधिकारियों के फेक बयानों की बाढ़ः

DFRAC के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और पुलिस-प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प के दौरान सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में वीडियो वायरल किए गए। इनमें छात्रों पर कथित लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल से जुड़े कई वीडियो भी शामिल थे। इसी संवेदनशील माहौल में पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा हैंडल्स ने एक सुनियोजित रणनीति के तहत भारतीय सुरक्षा संस्थानों को विवाद में घसीटने का प्रयास किया। इन हैंडल्स ने सेना और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के नाम पर कई AI-जनरेटेड और डिजिटली अल्टर्ड वीडियो प्रसारित किए। इन वीडियो की टाइमिंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन्हें ठीक उस समय वायरल किया गया, जब दिल्ली प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई को लेकर सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा चल रही थी। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि इनका उद्देश्य इस माहौल में भड़काऊ नैरेटिव को और अधिक प्रभावी बनाना था।

इसी क्रम में भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल राजीव पुरी का एक वीडियो शेयर किया गया, जिसमें उन्हें कथित तौर पर यह कहते हुए दिखाया गया कि “सरकार ने आदेश दिया है कि दिल्ली में सेना की तैनाती करो और प्रदर्शन को बुरी तरह से कुचल दो।” DFRAC के तथ्यात्मक विश्लेषण में यह दावा पूरी तरह भ्रामक पाया गया। जांच में स्पष्ट हुआ कि यह वीडियो AI-जनरेटेड था और अधिकारी की आवाज़ तथा कथित बयान कृत्रिम रूप से तैयार किए गए थे। सार्वजनिक रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधिकारिक बयान उपलब्ध नहीं है। खुद भारतीय सेना की फैक्ट चेक यूनिट ने इसका खंडन करते हुए इसे फेक करार दिया है। इसी प्रकार दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी और PRO राजीव रंजन के नाम पर भी एक वीडियो प्रसारित किया गया, जिसमें उन्हें कथित रूप से यह कहते हुए दिखाया गया कि “हम तो प्रदर्शनकारियों के साथ हैं, लेकिन गृहमंत्री अमित शाह ने आदेश दिया है कि लाठीचार्ज करो।” हालांकि जांच में पाया गया कि यह वीडियो डिजिटली अल्टर्ड था। मूल वीडियो के साथ छेड़छाड़ कर उसमें फर्जी ऑडियो जोड़ा गया।

यही पैटर्न भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमरप्रीत सिंह के मामले में भी देखने को मिला। सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया गया, जिसमें उन्हें कथित रूप से यह कहते हुए दिखाया गया कि “दिल्ली में जो हो रहा है, उसे देखकर मैं हैरान और दुखी हूँ कि मौजूदा सरकार हमारे छात्रों के साथ कैसा बुरा बर्ताव कर रही है। भारतीय छात्र हमारे सिस्टम की रीढ़ हैं। Gen Z दुनिया को वैश्विक स्तर पर बदल रही है।” DFRAC के सत्यापन में यह दावा भी पूरी तरह भ्रामक निकला। वीडियो में प्रयुक्त ऑडियो और बयान डिजिटली अल्टर्ड थे तथा एयर चीफ मार्शल ने ऐसा कोई सार्वजनिक बयान कभी नहीं दिया। इन तीनों मामलों का विश्लेषण एक समान पैटर्न की ओर संकेत करता है। प्रोपेगेंडा नेटवर्क ने जानबूझकर सेना, वायुसेना और पुलिस जैसे उच्च विश्वसनीयता वाले संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारियों को अपने दुष्प्रचार का माध्यम बनाया।

फैक्ट चेक

3. भारतीय सेना के खिलाफ नकारात्मक प्रोपेगेंडाः

DFRAC के विश्लेषण में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा हैंडल्स ने दिल्ली प्रदर्शन को भारतीय सेना के साथ जोड़कर एक सुनियोजित दुष्प्रचार अभियान चलाया। इस अभियान में सेना को लेकर परस्पर विरोधाभासी, लेकिन समान रूप से भ्रामक दो नैरेटिव तैयार किए गए। पहला- नैरेटिव यह गढ़ा गया कि भारतीय सेना को दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के दमन के लिए तैनात किया गया है और सेना छात्रों पर गोलीबारी तथा हिंसक कार्रवाई कर रही है। वहीं दूसरा- नैरेटिव यह बनाया गया कि भारतीय सेना के जवान सरकार के आदेशों से असंतुष्ट होकर छात्रों के समर्थन में विद्रोह कर रहे हैं। दोनों दावे तथ्यात्मक रूप से निराधार होने के बावजूद इन्हें बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया। विश्लेषण के दौरान पाया गया कि कई पाकिस्तानी हैंडल्स ने लगातार ऐसे पोस्ट किए, जिनमें दावा किया गया कि दिल्ली में कानून-व्यवस्था संभालने के लिए सेना को बुला लिया गया है और सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की है। कुछ पोस्टों में यह भी आरोप लगाया गया कि सेना ने छात्रों की बेरहमी से पिटाई की और आंदोलन को बलपूर्वक कुचलने की कार्रवाई शुरू कर दी है। इन दावों को कथित वीडियो और तस्वीरों के माध्यम से विश्वसनीय बनाने की कोशिश की गई, ताकि सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं में भय, आक्रोश और भ्रम पैदा किया जा सके।

हालांकि, DFRAC के सत्यापन में यह पूरा नैरेटिव भ्रामक पाया गया। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी और घटनाक्रम के विश्लेषण से स्पष्ट है कि दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान भारतीय सेना की कोई तैनाती नहीं की गई थी। कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के पास है। ऐसे में सेना द्वारा प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी, लाठीचार्ज या किसी प्रकार की कार्रवाई से जुड़े सभी दावे तथ्यहीन और मनगढ़ंत हैं। दुष्प्रचार का दूसरा पैटर्न भी सुनियोजित था। जहां एक ओर सेना को प्रदर्शनकारियों का दमन करने वाली संस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया, वहीं दूसरी ओर यह दिखाने का प्रयास किया गया कि सेना के जवान स्वयं सरकार के खिलाफ खड़े हो गए हैं और छात्रों के आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। इस नैरेटिव को स्थापित करने के लिए छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा का एक वीडियो साझा किया गया, जिसमें जवान मोटरसाइकिल राइड करते हुए दिखाई दे रहे थे। इस असंबंधित वीडियो को भ्रामक कैप्शन के साथ पोस्ट कर दावा किया गया कि भारतीय सेना के जवान दिल्ली पहुंचकर छात्रों के समर्थन में प्रदर्शन में शामिल हो रहे हैं और उन्होंने सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया है। इस प्रकार पुराने और असंबंधित वीडियो का पुनः उपयोग (Recontextualization) कर झूठा नैरेटिव गढ़ा गया।

फैक्ट चेकः 1, 2, 3, 4

4. प्रदर्शनकारियों की मौत और सेना से टकराव का फेक नरेटिव

DFRAC के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि दिल्ली प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा नेटवर्क ने केवल फेक वीडियो और डिजिटली अल्टर्ड कंटेंट तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि ऐसे मनगढ़ंत दावे भी गढ़े, जिनका उद्देश्य लोगों की भावनाओं को भड़काना और स्थिति को अधिक गंभीर एवं हिंसक दिखाना था। इन दावों को ऐसे समय में प्रसारित किया गया, जब प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई को लेकर सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा चल रही थी। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि इन पोस्टों का उद्देश्य केवल गलत सूचना फैलाना नहीं, बल्कि तनावपूर्ण माहौल को और अधिक उग्र बनाना था।

विश्लेषण के दौरान पाया गया कि ‘South Asia Rights Watch’ नामक एक प्रोपेगेंडा हैंडल ने दावा किया कि दिल्ली में सेना द्वारा की गई कथित फायरिंग और लाठीचार्ज में 20 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई है। इस दावे को बिना किसी आधिकारिक पुष्टि, विश्वसनीय स्रोत या तथ्यात्मक साक्ष्य के सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया। हालांकि, DFRAC के सत्यापन में यह दावा पूरी तरह फर्जी और भ्रामक पाया गया। जांच के दौरान दिल्ली पुलिस का आधिकारिक बयान/ट्वीट मिला, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि प्रदर्शन के दौरान कोई भी प्रदर्शनकारी हताहत नहीं हुआ है। इस प्रकार, 20 लोगों के मारे जाने का दावा पूरी तरह मनगढ़ंत था।

इसी तरह कई अन्य पोस्टों में यह भी दावा किया गया कि दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान भारतीय सेना ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों ने भी सेना पर हमला कर दिया। इस प्रकार के पोस्टों के माध्यम से यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास किया गया कि राजधानी में सेना और आम नागरिक आमने-सामने आ गए हैं तथा स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो चुकी है। DFRAC के विश्लेषण में यह दावा भी तथ्यहीन पाया गया। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान भारतीय सेना की कोई तैनाती ही नहीं की गई थी। कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के पास थी। ऐसे में सेना द्वारा लाठीचार्ज किए जाने या प्रदर्शनकारियों द्वारा सेना पर पलटवार करने का प्रश्न ही नहीं उठता। यह नैरेटिव पूरी तरह काल्पनिक घटनाओं पर आधारित था। इन मामलों का विश्लेषण दर्शाता है कि प्रोपेगेंडा नेटवर्क ने “Mass Casualty Disinformation” और “Escalation Narrative” (स्थिति को वास्तविकता से अधिक हिंसक और अराजक दिखाने वाला नैरेटिव) जैसी रणनीतियों का इस्तेमाल किया।

5. दिल्ली पुलिस ने 480 पाकिस्तानी यूजर्स पर कार्रवाई की

दिल्ली प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया पर चलाए गए दुष्प्रचार अभियान की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली पुलिस भी पाकिस्तान से संचालित संदिग्ध सोशल मीडिया नेटवर्क पर लगातार नजर बनाए हुए है। फेक न्यूज, भ्रामक दावों और भड़काऊ नैरेटिव के जरिए माहौल खराब करने की कोशिशों को देखते हुए पुलिस ने न केवल निगरानी बढ़ाई, बल्कि आम नागरिकों, विशेष रूप से छात्रों और युवाओं को भी ऐसे विदेशी प्रोपेगेंडा नेटवर्क से सतर्क रहने की अपील की। दिल्ली पुलिस द्वारा जारी एक आधिकारिक पोस्ट में बताया गया कि पाकिस्तान से संचालित 480 सोशल मीडिया हैंडल्स की पहचान की गई, जो सुनियोजित तरीके से गलत और भ्रामक सूचनाएं फैलाने के अभियान में शामिल थे। दिल्ली पुलिस ने जानकारी दी कि इन सभी 480 सोशल मीडिया हैंडल्स को ब्लॉक कर दिया गया है, ताकि इनके माध्यम से फैलाए जा रहे दुष्प्रचार को रोका जा सके।

अपने आधिकारिक संदेश में दिल्ली पुलिस ने छात्रों और युवाओं से अपील करते हुए कहा कि वे ऐसे विदेशी सोशल मीडिया अकाउंट्स से सावधान रहें, जो भारत की आंतरिक परिस्थितियों को लेकर अफवाहें और भ्रामक दावे प्रसारित कर रहे हैं। पुलिस ने लोगों से किसी भी वायरल पोस्ट, वीडियो या दावे पर बिना सत्यापन विश्वास न करने तथा केवल आधिकारिक और विश्वसनीय स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर भरोसा करने का आग्रह किया है।

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निष्कर्षः

DFRAC के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि दिल्ली प्रदर्शन की आड़ में पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा नेटवर्क ने फेक न्यूज, डिजिटली अल्टर्ड वीडियो, AI-जनरेटेड कंटेंट और मनगढ़ंत दावों के जरिए सुनियोजित सूचना युद्ध चलाने का प्रयास किया। इस अभियान का उद्देश्य प्रदर्शन को अधिक हिंसक दिखाना, भारतीय सुरक्षा संस्थानों की छवि धूमिल करना और सामाजिक तनाव को बढ़ाना प्रतीत होता है।