SIR and Musims

DFRAC विशेषः SIR के बहाने मीडिया और सोशल मीडिया पर मुस्लिम विरोधी नफरत!

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पिछले कुछ वर्षों में भारत में डिजिटल स्पेस—खासकर मीडिया और सोशल मीडिया—लोकतांत्रिक विमर्श का एक अहम मंच बनकर उभरा है। लेकिन इसी डिजिटल स्पेस का एक चिंताजनक पक्ष भी सामने आया है, जहां सूचनाओं की आड़ में नफरत, भ्रामक खबरें, सेलेक्टिव नैरेटिव और लक्षित समुदायों के खिलाफ दुष्प्रचार को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालिया समय में SIR (Special Intensive Revision) की प्रक्रिया के दौरान भी सोशल मीडिया पर ऐसी प्रवृत्ति देखने को मिली है। जिस प्रशासनिक प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूचियों की शुद्धता सुनिश्चित करना बताया गया है, उसी प्रक्रिया की आड़ लेकर मीडिया और सोशल मीडिया पर मुस्लिमों को संदेह के दायरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है।

SIR की शुरुआत के साथ ही कुछ टीवी डिबेट्स, डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने इसे तथाकथित “फर्जी वोटर्स”, “घुसपैठ” और “डेमोग्राफिक बदलाव” जैसे शब्दों से जोड़ना शुरू किया। इस नैरेटिव में बार- बार मुस्लिम समुदाय को अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से निशाना बनाया गया। SIR से जुड़े कीवर्ड्स के साथ मुस्लिम विरोधी कंटेंट की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हेट स्पीच, अपमानजनक शब्दों, सांकेतिक भाषा और भ्रामक तस्वीरों और वीडियो के ज़रिये एक संगठित नैरेटिव को आगे बढ़ाया गया। कई मामलों में पुराने या असंबंधित वीडियो को SIR से जोड़कर पेश किया गया, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि यह प्रक्रिया विशेष रूप से मुस्लिमों के खिलाफ है। 

मुख्यधारा के मीडिया का एक वर्ग भी इस ऑनलाइन नैरेटिव से अछूता नहीं रहा। बहसों में तथ्यों की जगह आरोपों को तरजीह दी गई और संतुलित आवाज़ों की बजाय नफरती बयानों को मंच दिया गया। यह रिपोर्ट SIR की शुरुआत से लेकर अब तक मीडिया और सोशल मीडिया पर फैलाई गई मुस्लिम विरोधी नफरत का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें यह समझने की कोशिश की गई है कि किस तरह डिजिटल माध्यमों के ज़रिये सांप्रदायिक एजेंडा चलाया गया।

इस रिपोर्ट के मुख्य बिन्दू निम्नलिखित हैं-

  1. SIR, आधार और मुस्लिम विरोधी नफरत
  2. बांग्लादेशी और रोहिंग्या के बहाने निशाने पर मुस्लिम
  3. इकोसिस्टम: संगठित और सामूहिक अभियान 
  4. कंटेंट का कॉपी-पेस्ट पैटर्न
  5. फेक कंटेंट और भ्रामक सामग्री 

1. SIR, आधार सैचुरेशन और मुस्लिम विरोधी नफरतः

जब बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) चल रहा था। तब मीडिया और सोशल मीडिया पर एक खास नैरेटिव तेजी से उभरने लगा। इस नैरेटिव का केंद्र बिहार का सीमांचल इलाका था, जो मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। आधार सैचुरेशन के आंकड़ों को संदर्भ से अलग कर इस तरह पेश किया गया, मानो सीमांचल में आधार पंजीकरण का अधिक होना “घुसपैठ”, “अवैध नागरिकों” और “फर्जी पहचान” का प्रमाण हो। इस पूरी कवरेज और ऑनलाइन चर्चाओं में निशाना स्पष्ट रूप से मुस्लिम समुदाय था, जबकि SIR और आधार से जुड़े तथ्यों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया।

मीडिया डिबेट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स में बार-बार यह दावा किया गया कि सीमांचल में आधार सैचुरेशन का प्रतिशत असामान्य है और यह किसी साजिश की ओर इशारा करता है। “बॉर्डर इलाका”, “डेमोग्राफिक बदलाव” और “घुसपैठ” जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर एक डरावना चित्र खड़ा किया गया। इस फ्रेमिंग में यह मान लिया गया कि अधिक आधार पंजीकरण होना अपने आप में संदिग्ध है। जबकि हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह साफ होता है कि आधार सैचुरेशन केवल सीमांचल तक सीमित नहीं है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कई जिलों में आधार सैचुरेशन सीमांचल से भी अधिक है। इसी तरह, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कई जिलों में आधार पंजीकरण का प्रतिशत सीमांचल के आंकड़ों से कहीं ज्यादा है। लेकिन इन क्षेत्रों को कभी “घुसपैठ का केंद्र” या “संदिग्ध आबादी” के रूप में पेश नहीं किया गया। यह चयनात्मक दृष्टिकोण इस बात की ओर इशारा करता है कि मुद्दा आधार या SIR नहीं, बल्कि एक खास समुदाय को कठघरे में खड़ा करना था।

SIR जैसी प्रशासनिक प्रक्रिया को आधार से जोड़कर, और फिर आधार सैचुरेशन को घुसपैठ से जोड़ना, तथ्यों का सरलीकरण नहीं बल्कि उनका दुरुपयोग है। इस तरह की रिपोर्टिंग और ऑनलाइन नैरेटिव ने मुस्लिम समुदाय को संदेह के घेरे में डाल दिया, जबकि वही पैमाने देश के अन्य हिस्सों पर लागू करने पर यह नैरेटिव स्वतः ही ढह जाता है।

प्रोपेगेंडा बनाम फैक्टः

आधार सैचुरेशन के आंकड़ों को आधार बनाकर यह दावा किया जाने लगा कि सीमांचल में “100 लोगों पर 120 आधार कार्ड” जैसी स्थिति है, जो कथित तौर पर बांग्लादेशी घुसपैठ और अवैध आबादी की ओर इशारा करती है। कई टीवी डिबेट्स, हेडलाइंस और डिजिटल रिपोर्ट्स में इस डेटा को सनसनीखेज अंदाज में पेश किया गया और सीधे-सीधे मुस्लिम आबादी को संदेह के दायरे में खड़ा किया गया। 

हालांकि, एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने के बाद जारी आधिकारिक आंकड़ों ने इस पूरे नैरेटिव की बुनियाद पर ही सवाल खड़े कर दिए। किसी भी आधिकारिक बयान में एसआईआर के दौरान “घुसपैठियों” या बड़े पैमाने पर अवैध नागरिकता का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया। जो यह स्पष्ट करता है कि एसआईआर की घोषणा के समय आधार सैचुरेशन के आंकड़ों का उपयोग तथ्यात्मक विश्लेषण के बजाय एक सांप्रदायिक नैरेटिव गढ़ने के लिए किया गया। बिना आधिकारिक पुष्टि के सीमांचल और वहां के मुस्लिम समुदाय को निशाने पर लेना न केवल भ्रामक था, बल्कि सामाजिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ावा देने वाला कदम था। यह मामला मीडिया की जिम्मेदारी, डेटा की सही व्याख्या और अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ फैलाए जा रहे संदेहपूर्ण विमर्श पर गंभीर सवाल खड़े करता है। 

बिहार की SIR में क्या निकला?

सत्य हिन्दी के एक लेख के मुताबिक, ‘1 अक्टूबर 2025 को जारी अंतिम मतदाता सूची में 7.42 करोड़ वोटर बचे, जो पहले 7.89 करोड़ थे। हटाए गए 52.9 लाख नामों में 22.34 लाख मृतक, 36.44 लाख प्रवासी (देश के अंदर ही), 6.85 लाख डुप्लीकेट, और सिर्फ 11,484 ऐसे जिनका पता नहीं चला। नेपाली, बांग्लादेशी या रोहिंग्या का नामोनिशान नहीं। इस मुद्दे पर देश के मीडिया ने गंभीरता से सवाल किया। एक-दो नहीं, चार सवाल किये गये। लेकिन देश की सुरक्षा और अस्मिता से जुड़े इन सवालों का कोई जवाब चुनाव आयोग नहीं दे सका। क्या कोई घुसपैठिया था ही नहीं, या मिला नहीं? अब ये 11,484 लोग कौन हैं, जिनका अता पता नहीं मिला? क्या इन्हें घुसपैठिए मानें? अगर हां, तो उनके नाम-पते पुलिस और गृह मंत्रालय को क्यों नहीं सौंपे गए? चुनाव आयोग खुद इनके विदेशी होने पर शक करता है, क्योंकि ये संख्या भी कुल वोटरों का सिर्फ 0.014% है। यानी यह संख्या – कोई बड़ा “आक्रमण” नहीं। आयोग की प्रेस रिलीज (जुलाई 2025) में भी सिर्फ नियमित सफाई की बात है, घुसपैठियों का जिक्र नहीं।’

“घुसपैठ” पर राजनीतिक शोर: झारखंड, बिहार और अब बंगालः

भारतीय चुनावी राजनीति में “घुसपैठ” का मुद्दा अब एक दोहराया जाने वाला पैटर्न बन चुका है, जिसे हर चुनाव से पहले उछाला जाता है। पहले झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान बांग्लादेशी घुसपैठ का शोर मचाया गया, जहां इसे जनसांख्यिकीय बदलाव और सुरक्षा से जोड़कर पेश किया गया। हालांकि, चुनाव समाप्त होने के बाद न तो किसी सरकारी रिपोर्ट में यह स्पष्ट हो पाया कि झारखंड में वास्तव में कितने घुसपैठिये मौजूद हैं और न ही कोई ठोस आंकड़ा सार्वजनिक किया गया।

इसके बाद यही नैरेटिव बिहार चुनाव के समय दोहराया गया। सीमांचल क्षेत्र को केंद्र में रखकर घुसपैठ की आशंका जताई गई और इसे आधार, जनगणना और मतदाता सूची जैसे मुद्दों से जोड़ा गया। मीडिया और राजनीतिक मंचों पर गंभीर दावे किए गए, लेकिन एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद भी यह सामने नहीं आ सका कि बिहार में कथित घुसपैठियों की संख्या कितनी है या वे कहां पाए गए।

अब यही मुद्दा पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान फिर से उठाया जा रहा है। एक बार फिर सीमावर्ती जिलों और मुस्लिम आबादी को संदेह के घेरे में रखकर घुसपैठ का खतरा बताया जा रहा है। लेकिन झारखंड और बिहार के अनुभव यह दिखाते हैं कि यह मुद्दा ठोस तथ्यों से अधिक चुनावी रणनीति के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। बार-बार आरोप लगाना, लेकिन कभी भी सत्यापित आंकड़े सामने न लाना, इस पूरे विमर्श की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है और यह संकेत देता है कि “घुसपैठ” का नैरेटिव वास्तविक समस्या से अधिक राजनीतिक ध्रुवीकरण का औजार बन चुका है। 

बंगाल की SIR में क्या आंकड़े सामने आए?

पश्चिम बंगाल में एसआईआर के आंकड़े जारी किए गए। मीडिया में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, कुल 58,20,898 नाम मसौदा मतदाता सूची से हटाए गए। इन हटाए गए नामों में सबसे बड़ा हिस्सा उन मतदाताओं का था, जिनकी मृत्यु हो चुकी थी। ऐसे 24,16,852 नाम सूची से निकाले गए, जो यह दिखाता है कि मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध रखने की प्रक्रिया के तहत मृत मतदाताओं को हटाया गया। इसके अलावा, 19,88,076 मतदाता ऐसे पाए गए, जो किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित हो चुके थे।

आंकड़ों के अनुसार, 12,20,038 लोग लापता की श्रेणी में पाए गए। वहीं, 1,38,328 नाम डुप्लीकेट पाए गए, जिन्हें एक से अधिक बार दर्ज होने के कारण हटाया गया। इसके अलावा 57,604 नाम अन्य कारणों से हटाए गए।

मुर्शिदाबाद जिला, जो बांग्लादेश की सीमा से सटा होने के कारण अक्सर राजनीतिक भाषणों और चुनावी बहसों में उठाया जाता रहा है, लंबे समय से घुसपैठ और अवैध गतिविधियों के नैरेटिव से जोड़ा जाता है। लेकिन उपलब्ध आंकड़े इस प्रचार के विपरीत तथ्य प्रस्तुत करते हैं। ‘द वायर हिन्दी’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक जिले की मुस्लिम-बहुल विधानसभा सीटों में प्रशासनिक प्रक्रियाओं में किसी तरह की असामान्यता नहीं दिखती। उदाहरण के तौर पर, डोमकल विधानसभा क्षेत्र, जहाँ मुस्लिम आबादी 77.67 प्रतिशत है, वहाँ ‘नो मैपिंग’ की दर केवल 0.42 प्रतिशत दर्ज की गई। इसी तरह रानीनगर (75.40 प्रतिशत मुस्लिम) में यह दर 0.91प्रतिशत और हरिहरपाड़ा (74.96 प्रतिशत मुस्लिम) में महज 0.60 प्रतिशत रही। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि सीमा से निकटता और धार्मिक संरचना को संदिग्ध ठहराने वाला विमर्श वास्तविकता से मेल नहीं खाता।

2-बांग्लादेशी और रोहिंग्या के बहाने निशाने पर मुस्लिमः

“बांग्लादेशी” और “रोहिंग्या” जैसे शब्दों का इस्तेमाल बीते कुछ वर्षों में एक राजनीतिक और मीडिया टूल के रूप में किया गया है, जिसके ज़रिये भारतीय मुस्लिम समुदाय को संदेह के घेरे में खड़ा किया गया। सीमावर्ती राज्यों या मुस्लिम-बहुल इलाकों में जनसंख्या, पहचान और दस्तावेज़ से जुड़े हर मुद्दे को इन कथित घुसपैठियों से जोड़ दिया जाता है। बिना ठोस आंकड़ों या आधिकारिक पुष्टि के इस नरेटिव को बढ़ाया जाता है। इस नैरेटिव का उद्देश्य वास्तविक प्रशासनिक समस्याओं से ध्यान हटाकर सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना और मुस्लिम पहचान को सुरक्षा खतरे के रूप में स्थापित करना है। 

भारत में कितने रोहिंग्या-बांग्लादेशी घुसपैठिएं?

घुसपैठ और अवैध प्रवास को लेकर अलग-अलग आंकड़े दिखते हैं। The Economic Times की एक पुरानी रिपोर्ट में सरकार ने कहा था कि लगभग 2 करोड़ अवैध बांग्लादेशी भारत में रह रहे हैं। दूसरी तरफ़ India TV के हवाले से यह रिपोर्ट किया गया कि 2014 से अब तक 23,926 घुसपैठियों को गिरफ्तार किया गया है और भारत-चीन सीमा पर कोई मामला नहीं है, जो वास्तविक सरकारी डेटा पर आधारित है।

BBC हिंदी की कवरेज में बताया गया कि इस मुद्दे पर सरकार और बीजेपी के बीच भी आंकड़ों को लेकर मतभेद हैं, और मीडिया तथा राजनीतिक मंचों पर इसे किस तरह जनता के सामने पेश किया जा रहा है—वह भिन्न है। कुल मिलाकर, जबकि कुछ सूचनाएँ आधिकारिक गिरफ्तारी आंकड़ों पर आधारित हैं, बड़ी संख्या और “घुसपैठियों की वास्तविक मौजूदगी” जैसे दावे अक्सर व्याख्या या बयान पर आधारित रहे हैं, जिनका सत्यापन चुनौतिपूर्ण है।

सोशल मीडिया पर एक संगठित हेट-नैरेटिव की स्पष्ट झलक देती हैं, जिसमें “बांग्लादेशी” और “रोहिंग्या” पहचान का इस्तेमाल कर भारतीय मुसलमानों को निशाना बनाया गया है। अलग-अलग अकाउंट्स द्वारा शेयर की गई पोस्ट्स में बिना किसी आधिकारिक स्रोत या प्रमाण के करोड़ों की संख्या में घुसपैठियों के दावे किए गए हैं। कहीं 5 करोड़ तो कहीं 10 करोड़ अवैध घुसपैठियों की बात कही गई है, जो अपने आप में अतार्किक और तथ्यहीन है। 

इन पोस्ट्स का एक समान पैटर्न है— पहला, मुसलमानों को “अवैध”, “घुसपैठिया” और “देश पर बोझ” के रूप में चित्रित करना। दूसरा, वोटर लिस्ट, आधार और नागरिकता जैसे प्रशासनिक मुद्दों को सीधे धार्मिक पहचान से जोड़ना। तीसरा, भय और आक्रोश पैदा करने वाली भाषा का इस्तेमाल, जैसे “देश की ज़मीन कब्जा”, “रोज़गार छीनना”, और “राजनीति बदल देना”।

3. इकोसिस्टम: संगठित और सामूहिक अभियानः

यह इकोसिस्टम किसी अचानक या स्वतः उत्पन्न प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं है, बल्कि एक संरचित और समन्वित संचार प्रक्रिया के रूप में कार्य करता दिखाई देता है। इसमें राजनीतिक बयानों, मुख्यधारा मीडिया की कवरेज, डिजिटल पोर्टल्स, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और ऑनलाइन नेटवर्क्स की भूमिका आपस में जुड़ी हुई होती है। किसी एक मंच पर उठाया गया विमर्श कम समय में अन्य प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच जाता है और वहां अलग-अलग स्वरूपों में दोहराया जाता है।

उदाहरण के तौर पर, पत्रकार अमन चोपड़ा द्वारा सोशल मीडिया पर किया गया एक पोस्ट देखा जा सकता है, जिसमें उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठ से जुड़ा एक पोस्ट शेयर किया था। इसके बाद वही बयान विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ग्राफिक्स और उद्धरण के रूप में प्रसारित होने लगा। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि किस तरह किसी एक व्यक्ति या अकाउंट की राय डिजिटल माध्यमों के जरिए व्यापक विमर्श का हिस्सा बन जाती है, भले ही उस पर अलग-अलग दृष्टिकोण और व्याख्याएं मौजूद हों।

सुदर्शन न्यूज के पत्रकार कुमार सागर का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया। इसके साथ कैप्शन दिया गया, ‘अगर आपको मुंबई के कई इलाकों में चुनाव जीतना है तो रोहिंग्या-बांग्लादेशी के पैर पकड़ने पड़ेंगे। अबू आजमी के इलाके में भारी मात्रा में रोहिंग्या-बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं।’ हालांकि, यह पूरा बयान सरकारी आंकड़ों से मेल नहीं खाता। टीवी-9 भारतवर्ष की एक रिपोर्ट के मुताबिक, “पिछले 3 वर्षों में मुंबई पुलिस ने 928 से अधिक बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया, लेकिन, लचर न्यायिक प्रक्रिया के कारण अब तक केवल 222 बांग्लादेशियों को ही डिपोर्ट किया जा सका है. स्पेशल ब्रांच के अनुसार, 2024 में मुंबई में 413 बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 133 को निर्वासित किया गया. 2023 में, पुलिस ने 368 बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया, जिनमें से केवल 68 को ही डिपोर्ट कर पाया और 2022 में 147 अवैध बांग्लादेशी में से केवल 21 को डिपोर्ट करने में कामयाबी मिली थी।”

4. कंटेंट का कॉपी-पेस्ट पैटर्नः

SIR और घुसपैठ के बहाने मुस्लिमों को टारगेट करने के लिए सोशल मीडिया पर एक ही तरह के पोस्ट शेयर किए जाते हैं, जो कॉपी पेस्ट पैटर्न पर आधारित होते हैं। जैसे एक सूचना इस प्रकार से फैलाई गई कि पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी सिर्फ इसलिए SIR का विरोध कर रही हैं, क्योंकि 60 लाख बांग्लादेशी और 34 लाख मृतक वोटर मिलाकर कुल 1 करोड़ वोटरलिस्ट से नाम हटेंगे, हालांकि अभी तक SIR में यह कन्फर्म नहीं हो पाया है कि कितने बांग्लादेशी और रोहिंग्या वोटर्स पाए गए हैं। वहीं मृतक वोटरों की संख्या भी 24 लाख के आस-पास है, जो 34 लाख के किए गए दावे से 10 लाख कम है। इसके अलावा कई ऐसे मैसेज हैं, जो कॉपी-पेस्ट पैटर्न पर शेयर किए गए हैं, जिनका जिक्र उपर किया जा चुका है।

5. फेक कंटेंट और भ्रामक सामग्रीः

घुसपैठ और SIR को लेकर सोशल मीडिया पर फेक और भ्रामक सामग्री भी खूब शेयर की गई है। अधूरी या संदर्भ से आधी-अधूरी जानकारी, झूठे आंकड़े और AI-जनित वीडियो व तस्वीरों के माध्यम से वास्तविकता को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। ये ऐसे कंटेंट हैं, जो भावनात्मक भाषा और सनसनीखेज दावों के साथ फैलाया जाता है, ताकि डर और अविश्वास पैदा हो सके। हम यहां कई भ्रामक सूचनाओं का फैक्ट चेक प्रदान कर रहे हैं।

फेक/भ्रामक न्यूज-1

एक वीडियो के साथ दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल में SIR के शुरु होने के बाद बांग्लादेशी और रोहिंग्या भागने लगे हैं। जबकि इसकी सच्चाई यह है कि यह वीडियो बांग्लादेश के खुलना के मोंगला घाट पर रोजाना आने-
जाने वाले यात्रियों का है।

फेक/भ्रामक न्यूज -2

भारी संख्या में वोटरलिस्ट रखे जाने का एक वीडियो शेयर कर दावा किया गया है कि यह वीडियो पश्चिम बंगाल का है, जहां एक-एक घुसपैठिए के पास 50-50 वोटर आईडी है। जब इस वीडियो की जांच की गई तो पाया गया कि यह वीडियो तेलंगाना के होने का आरोप लगाकर बीआरएस के नेता ने चुनाव आयोग से शिकायत की थी।

फेक/भ्रामक न्यूज-3

लुंगी और टोपी पहने एक शख्स का वीडियो शेयर किया गया है, जिसमें वह दावा करता है वह बांग्लादेशी है और कोलकाता में रहता है। वह दावा करता है कि जल्द ही पश्चिम बंगाल में भी बांग्लादेशियों की सत्ता होगी। इस वीडियो की जांच में पाया गया कि यह AI-जनरेटेड वीडियो है, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।

फेक/भ्रामक न्यूज-4

मुस्लिमों की भीड़ का एक वीडियो शेयर कर दावा किया गया कि SIR प्रक्रिया शुरु होने के बाद पश्चिम बंगाल से रोहिंग्या की वापस हो रही है। हालांकि फैक्ट चेक में पाया कि यह इज्तेमा का पुराना वीडियो है, जो SIR शुरु होने से पहले का है।

निष्कर्षः

यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि सोशल मीडिया पर एसआईआर और आधार सैचुरेशन को सुनियोजित तरीके से मुस्लिम विरोधी नैरेटिव में बदला गया। मीडिया, सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानों के समन्वय से एक संगठित हेट-इकोसिस्टम खड़ा किया गया, जिसमें चयनित डेटा, भ्रामक दावे और AI-जनित कंटेंट का व्यापक इस्तेमाल हुआ। आधिकारिक आंकड़ों और जांच प्रक्रियाओं ने इन दावों की पुष्टि नहीं की, फिर भी नफरत फैलाने वाला विमर्श लगातार जारी रहा। यह प्रवृत्ति न केवल तथ्यात्मक सत्य को कमजोर करती है, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद और सामाजिक सौहार्द के लिए भी गंभीर चुनौती पेश करती है।