पाकिस्तान हर साल कश्मीर पर प्रोपेगेंडा के लिए 5 फरवरी को ‘कश्मीर सॉलिडेरिटी डे’ मनाता है। हालांकि बीते कई वर्षों से यह दिन महज़ एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, बल्कि भारत-विरोधी नैरेटिव गढ़ने, भ्रामक सूचनाएँ फैलाने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव बनाने के लिए चलाए जा रहे एक सुनियोजित प्रोपेगेंडा अभियान का हिस्सा बन चुका है। इस दिन पाकिस्तान की राजनीतिक, सैन्य और मीडिया मशीनरी एक तय स्क्रिप्ट के तहत सक्रिय हो जाती है।
सरकारी बयानों से लेकर टेलीविज़न डिबेट्स, अख़बारों की हेडलाइनों से लेकर सोशल मीडिया हैशटैग अभियानों तक—हर स्तर पर कश्मीर को लेकर वही दावे, वही आरोप और वही भावनात्मक अपील दोहराई जाती है। X (पूर्व में ट्विटर), फेसबुक, यूट्यूब और टेलीग्राम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर समन्वित गतिविधियाँ यह संकेत देती हैं कि यह स्वतःस्फूर्त जन-अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक संगठित और रणनीतिक सूचना अभियान है। यह रिपोर्ट 5 फरवरी के आसपास वर्षों से चल रहे इसी पाकिस्तानी दुष्प्रचार का विश्लेषण प्रस्तुत करती है। अलग-अलग वर्षों के ट्रेंड, दोहराए गए नैरेटिव्स, प्रयुक्त हैशटैग्स और डिजिटल नेटवर्क्स के अध्ययन के ज़रिए यह समझने की कोशिश की गई है कि कश्मीर सॉलिडेरिटी के नाम पर किस तरह एक ही प्रोपेगेंडा मॉडल को हर साल नए संदर्भों में पेश किया जाता है।
कश्मीर के बहाने शहबाज शरीफ का दुष्प्रचारः
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ कश्मीर सॉलिडैरिटी डे के नाम पर कार्यक्रम में शामिल हुए। लेकिन इस दौरान उन्होंने कई झूठे और भ्रामक दावे किए। उन्होंने अपने स्पीच में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत को हराने और आतंकवाद फैलाने जैसी तथ्यहीन बातें कहीं। उन्होंने कश्मीर में कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन का राग अलापा। कश्मीर सॉलिडैरिटी डे पर प्रोपेगेंडा को बकायदा पाकिस्तान सरकार की आधिकारिक एक्स हैंडल से प्रचारित किया गया।

पाकिस्तानी दूतावासों की भूमिकाः
कश्मीर सॉलिडेरिटी डे के बहाने दुनियाभर में पाकिस्तानी दूतावासों और उच्चायोगों में प्रोपेगेंडा कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनकी गतिविधियां एक बड़े और समन्वित अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगेंडा अभियान का हिस्सा हैं और यह राजनयिक मंचों का दुरुपयोग का एक उदाहरण भी हैं। 5 फरवरी को ‘कश्मीर सॉलिडैरिटी डे’ के नाम पर पाकिस्तान ने दुनिया के अलग-अलग देशों में स्थित अपने दूतावासों, उच्चायोगों और वाणिज्य दूतावासों के ज़रिये एक साथ कार्यक्रम आयोजित किए। इन आयोजनों का स्वरूप, भाषा और नैरेटिव लगभग एक-सा होना इस बात की ओर इशारा करता है कि यह स्वतःस्फूर्त कूटनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि केंद्र से निर्देशित एक सुनियोजित अभियान था।
इन कार्यक्रमों में ‘मानवाधिकार उल्लंघन’, ‘कश्मीरी जनता की आवाज़’ और ‘अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ज़िम्मेदारी’ जैसे वही पुराने और बार-बार दोहराए जाने वाले दावे सामने आए। सोशल मीडिया पोस्ट्स और वीडियो क्लिप्स में भी यही पैटर्न दिखता है कि एक जैसी शब्दावली, समान हैशटैग्स और लगभग एक ही जैसी की गई पोस्टिंग। ध्यान देने वाली बात यह है कि इन आयोजनों में कश्मीर के जमीनी हालात या हालिया तथ्यों पर कोई ठोस चर्चा नहीं दिखाई देती। इसके बजाय भावनात्मक अपील, चयनित तस्वीरें और संदर्भ से काटे गए दावे पेश किए गए, जिनका उद्देश्य जानकारी देना नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने भारत के खिलाफ एक नकारात्मक छवि गढ़ना था। यह कूटनीति से ज़्यादा सूचना युद्ध (information warfare) का उदाहरण है।

एम्बेसी-लेवल प्रोपेगेंडाः राजनयिक मंचों का दुरुपयोग:
पाकिस्तान ने अपने राजनयिक मंचों का जिस तरह इस्तेमाल किया, वह पारंपरिक कूटनीति की सीमाओं से कहीं आगे जाता दिखता है। दुनियाभर में स्थित पाकिस्तानी दूतावासों और उच्चायोगों ने एक साथ कार्यक्रम आयोजित कर कश्मीर को लेकर वही तयशुदा आरोप और नैरेटिव दोहराए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह स्वतंत्र राजनयिक गतिविधि नहीं बल्कि केंद्र से निर्देशित एक समन्वित अभियान था। इन दूतावासी आयोजनों का स्वरूप लगभग एक जैसा रहा—सेमिनार, फोटो एग्ज़ीबिशन, भाषण और ‘विशेष सत्र’—जिनमें भारत पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए गए। कूटनीतिक मंचों का यह दुरुपयोग इस बात को रेखांकित करती है कि कश्मीर सॉलिडैरिटी डे के बहाने पाकिस्तान के लिए राजनयिक मंच संवाद का साधन नहीं, बल्कि सूचना युद्ध का औज़ार बन जाते हैं। दूतावासों को नैरेटिव फैलाने वाले केंद्रों में बदल देना न केवल कूटनीतिक मर्यादाओं पर सवाल खड़े करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रोपेगेंडा को वैधता देने की एक रणनीति भी उजागर करता है।

जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों की भूमिका पर सवालः
‘कश्मीर सॉलिडैरिटी डे’ पर जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान, उसकी महिला इकाई और विभिन्न शहरों की शाखाओं द्वारा आयोजित रैलियाँ, मार्च और सभाएँ किसी स्वतःस्फूर्त जनभावना का परिणाम नहीं, बल्कि सुनियोजित भीड़-निर्माण और नैरेटिव थोपने की रणनीति को दर्शाती हैं। इन आयोजनों में इस्तेमाल किए गए बैनर, पोस्टर और भाषणों की भाषा विशेष रूप से चिंताजनक है। ‘कश्मीर का हल ज़ोर-ए-शमशीर’, ‘कश्मीर 5 फरवरी’ जैसे नारे और प्रतीक खुले तौर पर संघर्ष और हिंसा को वैध ठहराने की मानसिकता को बढ़ावा देते हैं।

पाकिस्तान में एक्स (ट्विटर) पर ट्रेंडः
5 फरवरी को पाकिस्तान में ‘#KashmirSolidarityDay’ और ‘Kashmir’ जैसे हैशटैग्स ट्रेंड तो करते दिखाई देते हैं, लेकिन इन पर कुल ट्वीट्स की संख्या 10 हज़ार से भी कम दर्ज की गई। यह आंकड़ा उस दावे के बिल्कुल उलट है, जिसमें कश्मीर सॉलिडैरिटी डे को व्यापक जनसमर्थन और स्वतःस्फूर्त डिजिटल उभार के रूप में पेश किया जाता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि ट्रेंडिंग ग्राफ़ में अचानक उछाल और फिर तेज़ गिरावट देखी जाती है। यह पैटर्न आम तौर पर ऑर्गैनिक पब्लिक एंगेजमेंट में नहीं, बल्कि समन्वित पोस्टिंग और सीमित समय में किए गए बल्क ट्वीट्स में देखने को मिलता है। यानी ट्रेंड कुछ घंटों के लिए बनाया गया, लेकिन उसमें टिकाऊ भागीदारी या निरंतर चर्चा का अभाव रहा। अगर यह मुद्दा वास्तव में ज़मीनी स्तर पर व्यापक समर्थन और जनभावना को दर्शाता, तो ट्वीट्स की संख्या कहीं ज़्यादा होती और ट्रेंड लंबे समय तक स्थिर बना रहता। इसके बजाय, कम वॉल्यूम के साथ ट्रेंड करना इस बात की ओर इशारा करता है कि यह नैरेटिव सीमित अकाउंट्स और संगठित नेटवर्क्स द्वारा आगे बढ़ाया गया।

विगत वर्षों पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा और उसके आंकड़ेः
DFRAC की टीम ने इससे पहले भी #KashmirSolidarityDay पर पाकिस्तानी प्रोपेंगेंडा पर विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित किया था। हमारी रिपोर्ट में सामने आया था कि 5 फरवरी 2022 को भी #KashmirSolidarityDay हैशटैग पर बड़ी संख्या में ट्विट्स किए गए थे। हमारी रिपोर्ट में उपलब्ध डाटा के अनुसार 5 फरवरी को 24,000 से अधिक ट्वीट्स किए गए थे, जो इस साल के 10,000 पोस्ट्स से ज्यादा था। ड़ाटा का यह पैटर्न बता रहा है कि कश्मीर पर पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा ना सिर्फ धीरे-धीरे खत्म हो रहा है, बल्कि इसको जन समर्थन भी हासिल नहीं है।

पाकिस्तानी दूतावासों के कार्यक्रमों को नहीं मिला जन-समर्थन!
पाकिस्तानी दूतावासों द्वारा कश्मीर सॉलिडैरिटी डे पर शेयर की गई सोशल मीडिया पोस्ट्स पर मिलने वाली प्रतिक्रियाएँ इन कार्यक्रमों की वास्तविक लोकप्रियता को खुद ही उजागर कर देती हैं। कई आधिकारिक पोस्ट्स पर शून्य लाइक, कुछ पर एक या दो लाइक्स हैं। पाकिस्तानी दूतावासों के इन कार्यक्रमों में अधिकतम चार लाइक्स दर्ज किए गए हैं। यह आंकड़े उस बड़े दावे के बिल्कुल विपरीत हैं, जिसके तहत इन आयोजनों को अंतरराष्ट्रीय समर्थन और व्यापक भागीदारी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यह स्थिति तब और सवाल खड़े करती है जब इन दूतावासों में आयोजित कार्यक्रमों की तस्वीरों में दर्जनों लोग—कर्मचारी, अधिकारी और आमंत्रित अतिथि—स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। सामान्य तौर पर किसी भी दूतावास में कम से कम 10–15 कर्मचारी होते हैं, लेकिन सोशल मीडिया एंगेजमेंट यह संकेत देता है कि इन पोस्ट्स को लाइक करने में भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई गई। यदि इन कार्यक्रमों में वास्तविक उत्साह या प्रतिबद्धता होती, तो न्यूनतम स्तर की आंतरिक भागीदारी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर नज़र आती। कम एंगेजमेंट यह दर्शाता है कि कश्मीर सॉलिडैरिटी डे के नाम पर किए गए ये आयोजन जनसमर्थन या कूटनीतिक प्राथमिकता का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि एक औपचारिक खानापूर्ति भर हैं। लाइक्स और एंगेजमेंट के ये आंकड़े पाकिस्तान के दूतावासी प्रोपेगेंडा की खोखली वास्तविकता को उजागर करते हैं। मंच, बैनर और बयान मौजूद हैं, लेकिन समर्थन और रुचि का अभाव यह साबित करता है कि कश्मीर सॉलिडैरिटी डे अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति से ज़्यादा एक औपचारिक, यांत्रिक और अप्रभावी अभ्यास बनकर रह गया है।

पाकिस्तान के खिलाफ कश्मीरियों का प्रदर्शनः
कश्मीर के नाम पर प्रोपेगेंडा खड़ा करने की पाकिस्तान की पुरानी आदत इस बार उसी पर भारी पड़ गई। यूरोप भर में बसे कश्मीरियों ने पाकिस्तान के इस दिखावटी अभियान को सिरे से खारिज करते हुए साफ कहा कि यह आयोजन कश्मीर के प्रति किसी सहानुभूति का नहीं है। ब्रिटेन से लेकर बेल्जियम तक हुए विरोध प्रदर्शनों में कश्मीरियों ने पाकिस्तान पर कश्मीर में प्रॉक्सी युद्ध चलाने, आतंकवाद को संरक्षण देने और झूठे नैरेटिव फैलाने के गंभीर आरोप लगाए। सबसे तीखा विरोध ब्रिटेन में पाकिस्तानी दूतावास के बाहर देखने को मिला, जहाँ यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी (UKPNP) के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान को धोखेबाज़ करार दिया।

5 फरवरी को कश्मीर में क्या हो रहा था?
कश्मीर में 5 फरवरी को रोज़गार, विकास और सामाजिक संवाद से जुड़े कार्यक्रमों के रूप में सामने आया। कुपवाड़ा के रोशन मुस्तकबिल जैसे आयोजनों में युवाओं, स्थानीय नेताओं और विशेषज्ञों की भागीदारी यह दर्शाती है कि कश्मीर में प्राथमिकता अब भावनात्मक नारों की नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण की है। युवाओं के साथ संवाद, रोज़गार के अवसरों पर चर्चा और स्थानीय विरासत को समझने की कोशिश इस बात का संकेत है कि ज़मीनी स्तर पर फोकस स्थिरता और प्रगति पर है।

‘कश्मीर सॉलिडेरिटी डे के नाम धनउगाही और चंदाखोरी‘
कश्मीर के राजनीतिक कार्यकर्ता जावेद बेग पाकिस्तान के सॉलिडेरिटी डे वाले प्रोपेगेंडा को एक खोखला, झूठा और आत्मप्रचार से भरा प्रोपेगेंडा इवेंट बताते हैं। एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि यह है कि 5 फरवरी को मनाया जाने वाला यह दिन न तो कश्मीरियों से जुड़ा है और न ही ज़मीनी हकीकत से, बल्कि यह पाकिस्तान द्वारा हर साल दोहराया जाने वाला एक फर्जी नाटक है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में रहने वाले 99% से अधिक मुस्लिमों को इस तथाकथित दिवस के बारे में कोई जानकारी तक नहीं होती। यानी जिस मुद्दे पर पाकिस्तान दुनिया भर में शोर मचाता है, वह खुद कश्मीरियों के जीवन में किसी मायने का नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान ऐसे आयोजन कश्मीर के नाम विदेशों से चंदा इकट्ठा करने के लिए आयोजित करता है।

निष्कर्षः
कश्मीर सॉलिडैरिटी डे को लेकर पाकिस्तान द्वारा किए गए आयोजनों और सोशल मीडिया गतिविधियों से यह संकेत जरूर मिलता है कि इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जीवित रखने की कोशिश लगातार की जा रही है। हालांकि, इन प्रयासों की वास्तविक प्रभावशीलता और जनस्वीकृति सीमित दिखाई देती है। दूतावासों और आधिकारिक हैंडल्स पर पोस्ट की गई सामग्री पर कम जुड़ाव (engagement) यह दर्शाता है कि यह पहल व्यापक समर्थन हासिल करने में सफल नहीं हो पाई है।
दूसरी ओर, यूरोप समेत कई देशों में कश्मीरियों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शनों से यह भी स्पष्ट होता है कि कश्मीर मुद्दे को लेकर पाकिस्तान के खिलाफ नाराजगी मौजूद हैं। कुछ समूह पाकिस्तान के नैरेटिव से सहमत नहीं दिखते और इसे अपने अनुभवों से अलग मानते हैं। सच्चाई यही है कि कश्मीर पाकिस्तान के लिए एक मानवीय मुद्दा नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचने का एक विफल राजनीतिक हथकंडा बनकर रह गया है।

